अवध किशोर शर्मा/सारण (बिहार)। माघ गुप्त नवरात्रि के प्रथम दिन 19 जनवरी को सारण जिला के हद में सोनपुर स्थित सुप्रसिद्ध काली घाट पर बिहार के इकलौते दक्षिणेश्वरी काली मंदिर में प्रथम महाविद्या देवी काली की संध्याकालीन आरती में सैकड़ों श्रद्धालु सम्मिलित हुए। भक्तों ने इस अवसर पर देवी दुर्गा के महाविद्या स्वरूप देवी काली के भव्य श्रृंगार का दर्शन – पूजन किया।
मान्यता के अनुसार शक्ति के दस महान रहस्यमय स्वरूपों में मां काली को प्रथम और प्रधान महाविद्या माना गया है। वे काल, मृत्यु, अज्ञान और अहंकार का नाश करने वाली परम शक्ति हैं। यहां स्थापित मंदिर में मां काली की प्रतिरूप का रंग श्याम है, जो अनंत आकाश और कालातीत सत्ता का प्रतीक है। उनके केश खुले, नेत्र उग्र, जिह्वा बाहर निकली हुई और गले में नरमुंड का माला है।
चार भुजाओं में वे खड्ग (ज्ञान से अज्ञान का छेदन), कटा हुआ मस्तक (अहंकार का अंत) तथा अभय और वर मुद्रा धारण किए हैं। वे भगवान शिव पर स्थित दिखाई देती हैं, जो यह दर्शाता है कि चेतना (शिव) पर शक्ति (काली) का संचार ही सृष्टि को गतिमान करता है। वे समय की भी अधिष्ठात्री हैं जिनके अधीन जन्म-मृत्यु है। वे मोक्षदायिनी भी हैं।
भयावह दिखने पर भी माँ काली भक्तों के लिए करुणामयी, बंधनों से मुक्त करने वाली हैं। वे शून्य का भी शून्य हैं और पूर्णता की भी पराकाष्ठा हैं। यहां मां काली की साधना में निर्भयता, वैराग्य और सत्य आवश्यक है। तंत्र परंपरा में वे तामस से परे शुद्ध शक्ति हैं। उनकी उपासना से साधक को भय-नाश, आत्मबोध और सिद्धि प्राप्त होती है। काली उनमें आदि-शक्ति के रूप में मूल हैं।
मां काली विनाश नहीं, रूपांतरण हैं, अज्ञान का अंत कर ज्ञान का प्रकाश देने वाली, भय को हर कर मुक्ति का द्वार खोलने वाली परम माता है। वे काल यानी समय की देवी मानी जाती हैं। उनका स्वरूप भयंकर लेकिन रक्षक है। काले रंग की, लंबी जिह्वा, खुली आंखें, हाथ में खड्ग और नरमुंड माला। वे अज्ञान, अहंकार और नकारात्मक शक्तियों का विनाश करती हैं। तांत्रिक परंपरा के अनुसार यहां मां काली की साधना से भक्त को निर्भयता, शक्ति और मोक्ष प्राप्ति होती है।
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