गंगोत्री प्रसाद सिंह/हाजीपुर (वैशाली)। आजादी के 75 वर्ष, जहाँ पुरा देश आजादी का अमृत महोत्सव मना रहा है। वही स्वतन्त्रता आंदोलन में देश की आजादी के दीवानों का उत्तर भारत मे केन्द्र रहे वैशाली जिला मुख्यालय हाजीपुर स्थित ऐतिहासिक गांधी आश्रम अपनी बदहाली पर आंसू बहा रहा है।
जलियांवाला नरसंहार के बाद देश में अंग्रेजो के प्रति गुस्सा था। जनता में देश प्रेम की भावना जागृत हो रही थी। उसी काल मे बिहार के प्रथम सत्याग्रही जीएच हाई स्कूल के शिक्षक पंडित जयनन्दन झा ने सर्वप्रथम अपने स्कूल के कुछ छात्रों के साथ हिंदुस्तान सेवा दल नाम से एक टोली गठित की। वे अपनी टोली के साथ वुद्धिजीवियों और सामाजिक जनों से सम्पर्क कर देश प्रेम की भावना जागृत करने लगे।
सन 1920 आते आते इस संगठन से बिदुपुर के अक्षयवट राय, लालगंज जागोडीह के किशोरी प्रसन्न सिंह, दिघवारा मलखा चक के रामदेनी सिंह, जमालपुर के बसावन सिंह और अन्य लोग जुड़ गए।
पंडित जयनन्दन झा ने पोहियार स्टेट के जमींदार बाबू चन्द्रदीप नारायण सिंह से आश्रम के लिये मौजा चक अनवर (वर्तमान में हाजीपुर) में लगभग 2 बीघा जमीन दान में प्राप्त की। पंडित जयनन्दन झा का पत्नी के कांग्रेसी नेता मजहरुल हक से काफी सम्पर्क था। महात्मा गाँधी पश्चिम चंपारण जाने के क्रम में पटना में मजहरुल हक के घर रुके थे।
वही पंडितजी की मुलाक़ात गांधीजी से हुई और पटना से पश्चिम चंपारण जाने के रास्ते मे पंडित जयनन्दन झा के कहने पर हाजीपुर में 7 दिसम्बर 1920 को रुके। उसी दिन पंडित जयनन्दन झा ने पोहियार के जमींदार से मिले दान वाली जमीन में गांधीजी के हाथों आश्रम की नींव डलवाई।
गांधी जी उस दिन रात में यहीं रुके। गांधी जी को देखने के लिए हजारों जनता आश्रम पर पहुँची। जिस स्थान पर आश्रम की नींव रखी गई वहां तब कोई आबादी नही थी। खेत और आम एवं बांस के जंगलात थे, जो स्वतन्त्रता सेनानियों के लिये महफूज जगह थी। पंडित जी ने इस आश्रम का नाम गांधी आश्रम रखा।
स्वतन्त्रता आंदोलन के दौरान यह उत्तर भारत के क्रांतिकारियों का प्रमुख केंद्र रहा। स्थानीय क्रांतिकारी बाबू किशोरी प्रसन्न सिंह इस केंद्र के गरम दल और नरम दल के नेता थे। यह जिले के क्रान्तिकारी योगेंद्र शुक्ल, वीर बसावन सिंह, बैकुण्ठ शुक्ल, रामदेनी सिंह, गुलजार पटेल, बाबू अक्षयबट राय, सुरेश शुक्ल, राम मुरत शुक्ल के अलावे शहीद भगत सिंह, चन्द्रशेखर आजाद, बटुकेश्वर दत्त की गाँधी आश्रम शरण स्थली के साथ कर्मस्थली भी रही।
किशोरी प्रसन्न सिंह की पत्नी सुनीति देवी महिला क्रान्तिकारी संगठन की प्रमुख थी, जिनके साथ बैकुण्ठ शुक्ल की पत्नी राधिका देवी के अलावे दर्जनों वीरांगनायें भी थी। बिहार के प्रथम मुख्य मंत्री डॉ श्रीकृष्ण सिंह (श्रीबाबू), महेश बाबू, रामदयालु सिंह भी इस आश्रम में कई एक बार आये।
सन् 1942 के अंग्रेजो भारत छोड़ो आंदोलन के समय से बाबू दीपनारायण सिंह, एल पी शाही, सीताराम बाबू भी गान्धी आश्रम से जुड़े। यह ऐतिहासिक गांधी आश्रम अपने दामन में उन वीर स्वतन्त्रता सेनानियों और शहीदो की यादों को समेटे हुए है।
लकिन आज की स्थिति यह है कि आश्रम में स्थापित जिला खादी ग्रामोद्योग संघ सरकार (Government) की उदासीनता और इसके कर्मचारियों की लूट खसोट से खंडहर बन गया।
आश्रम परिसर में बाबू दीपनारायण सिंह संग्रहालय बना जो बन्द रहता है। नगरपालिका हाजीपुर की ओर से परिसर में एक बहुत सुंदर पार्क का निर्माण किया गया, लेकिन सुरक्षा कारणों से सिर्फ सुबह में 3 घण्टे के लिये खुलता है। इसी कैम्पस में संग्रहालय है, जिसमे जिले के स्वतन्त्रता सेनानियों की मूर्ति एक कमरे में कैद है।
जिसे 25 वर्ष बुबना जी के गोदाम में रहने के बाद यहां लाया जा सका। जिले का एक मात्र चालू पुस्तकालय गांधी स्मारक पुस्तकालय भी इसी कैम्पस में है। असामाजिक तत्वों का जमाबड़ा और नशेड़ी युवकों की वजह से मेन गेट में बराबर ताला लगे रहने की वजह से पुस्तकालय में पाठक नहीं आ रहे हैं।
पुरा परिसर एक गार्ड के भरोसे है। स्थानीय नगर थाना और पुलिस के उच्च अधिकारियो को परिसर में असामाजिक तत्वों के उत्पात की सूचना दी गई, लेकिन पुलिस द्वारा कोई कार्यवाही नही की गई। आज गांधी आश्रम स्थानीय जनप्रतिनिधियों और प्रशासन (Administration) की अनदेखी पर अपनी बदहाली का आंसू बहा रहा है।
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