एस. पी. सक्सेना/रांची (झारखंड)। मेसा के बिना पेसा अधूरा। लगातार जन दबाव, उच्च न्यायालय की कठोर टिप्पणी और आदिवासी मूलवासी जनाधिकार मंच के संघर्ष का परिणाम है कि आखिरकार पेसा लागू करने का निर्णय लिया गया हैं। अब मेसा के लिए निर्णायक संघर्ष होगा। उक्त बाते आदिवासी मूलवासी जनाधिकार मंच के केंद्रीय उपाध्यक्ष विजय शंकर नायक ने 24 दिसंबर को कही।
उन्होंने कहा कि अनुसूचित क्षेत्रों में आदिवासी स्वशासन की सुरक्षा और संवैधानिक अधिकारों की पूर्ण बहाली के बिना झारखंड का विकास अधूरा है। पेसा अधिनियम 1996 को केवल कागज़ों पर लागू कर देने से ग्राम सभा, जल, जंगल, ज़मीन तथा पारंपरिक स्वशासन की वास्तविक रक्षा संभव नहीं है। जब तक कि म्युनिसिपलिटीज एक्सटेंशन टू सिडूल्ड एरियाज (मेसा) को भी समान रूप से लागू नहीं किया जाता।
आदिवासी मूलवासी जनाधिकार मंच के केंद्रीय उपाध्यक्ष नायक ने कहा कि झारखंड में पेसा के लागू होने की घोषणा देर से सही, लेकिन जनता के संघर्ष, न्यायिक दबाव और निरंतर जनआंदोलन की जीत है। उन्होंने कहा कि भाजपा की 14 वर्षों की उदासीनता आज पूरी तरह बेनकाब हो गई है। कहा कि भारतीय जनता पार्टी झारखंड में लगभग 14 वर्षों तक सत्ता में रही, लेकिन पेसा कानून को लागू करने के बजाय उसे जानबूझकर रोके रखा।
यह न सिर्फ संवैधानिक व्यवस्था के साथ अन्याय था, बल्कि आदिवासी समाज, ग्राम सभाओं और उनके अधिकारों के प्रति स्पष्ट विरोधी रवैया भी था। नायक ने कहा कि भाजपा ने सत्ता में रहते हुए आदिवासी हितों की रक्षा करने के बजाय उन्हें कमजोर करने का काम किया है, जिसके कारण न्याय के लिए संघर्ष लंबा होता चला गया।
उन्होंने कहा कि झारखंड में आदिवासी स्वशासन, ग्रामसभा की सर्वोच्चता और प्राकृतिक संसाधनों पर मूलवासी समुदायों के अधिकारों की लड़ाई ने अब निर्णायक मोड़ ले लिया है। आदिवासी मूलवासी जनाधिकार मंच द्वारा वर्षों से चलाए गए जन संघर्ष, नागरिक दबाव और उच्च न्यायालय के हस्तक्षेप से अब पेसा कानून लागू होने की प्रक्रिया मजबूत हुई है। कहा कि देर से ही सही, न्याय की दिशा स्पष्ट हुई है।
हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि यही अधिकार भाजपा सरकारों ने 14 वर्षों तक रोके रखा। अब असली लड़ाई केवल कानून बनाने की नहीं, बल्कि इसे जमीनी स्तर पर ईमानदारी से लागू कराने और साथ ही मेसा बिल पारित कराने की है।
उन्होंने कहा कि भाजपा ने अपने शासन काल में ग्राम सभा के अधिकारों की अनदेखी की। पाँचवीं अनुसूची की भावना कमजोर की।
जल, जंगल और जमीन पर समुदाय के अधिकारों को सम्मान नहीं दिया तथा आदिवासी स्वशासन की आवश्यकता को राजनीतिक कारणों से दबाए रखा। इसलिए भाजपा को आज नैतिक रूप से आदिवासी समाज से माफी मांगनी चाहिए। नायक ने सरकार को स्पष्ट चेतावनी देते हुए कहा कि पेसा केवल कानून नहीं, बल्कि आदिवासी–मूलवासी समाज की अस्मिता और अस्तित्व का संरक्षण है। ग्राम सभा को अधिकार देना लोकतंत्र की जड़ों को मजबूत करना है।
सरकार किसी दबाव में पेसा को कमजोर न करे, तुरंत मेसा बिल पारित करने की दिशा में ठोस एवं सकारात्मक पहल करे। कहा कि आदिवासी–मूलवासी विरोधी नीतियों का विरोध और संवैधानिक अधिकारों की रक्षा का संघर्ष आगे भी जारी रहेगा।
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