अमित कुमार/मुजफ्फरपुर (बिहार)। देश में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी ने एक उम्मीद जगाई है। आज की महिला निर्भर नहीं है। वह हर मामले में आत्मनिर्भर और स्वतंत्र है। पुरुषों के बराबर सब कुछ करने में सक्षम भी है।
वर्तमान समय में नारी ने रूढ़िवादी बेड़ियों को तोड़ने की शुरूआत कर दिया है। यह एक सुखद संकेत है। लोगों की सोच बदल रही है, फिर भी इस दिशा मे और भी प्रयास करने की आवश्यकता है। अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस अपने आप में एक विशाल शब्द हैं।
भारत देश में महिला विकास की राह में आ रही बाधाओं पर वर्तमान में बहुत काम हुए हैं। हमें महिलाओं का सम्मान लिंग के आधार पर नहीं, बल्कि स्वयं की पहचान के लिए करना होगा।
हमें यह स्वीकार करना होगा कि घर और समाज की बेहतरी के लिए पुरुष और महिला दोनों समान रूप से योगदान करते हैं। हर जीवन को लाने वाली महिला है। वह अपने आसपास की दुनिया में बदलाव ला रही है। सबसे महत्वपूर्ण यह कि बच्चों की परवरिश और घर बनाने में एक महत्वपूर्ण भूमिका भी निभाती हैं।
महिलाओं की दिशा और दशा बदलने के लिए बहुत कुछ हुआ, लेकिन ज़मीनी स्तर पर अभी बहुत कुछ किया जाना बाकी है। देश में जैसा इंफ्रा का विकास तेजी से हुआ है, ठीक उसी तरह महिला सशक्तिकरण में भी देश तेजी से आगे बढ़ा हैं।
जातिवादी सोच से कुंद समाज में महिलाओं की बड़ी भागीदारी ने एक नई उम्मीद जगाई है। राजनीतिक दलों के सारे जातीय समीकरण इस दौर में महिलाएं फेल कर रही है। हर दौर में पढ़े लिखे जातीय समूह ने सत्ता पर अपना अधिकार जमाया है। आज देश की अति जातिवादी राजनीति में महिलाएं सारे प्रयोग को तोड़ रही हैं।
आज घर से बाहर निकलने वाली महिला आत्म सम्मान से अपनी जिम्मेदारी पूरी करती है। देश में महिला सशक्तिकरण के रूप में एक साइलेंट क्रांति आई है। साथ ही महिलाओं की राजनीति में बढ़ी भागीदारी के कारण सियासत का मिजाज बदला है। ग्राम पंचायत चुनाव में नए लोगों को मौका महिलाओं की वोट के कारण ही हुआ है।
हमारे देश में सरकार का आधार भी यही महिला सशक्तिकरण ही है। समाज के बेहतर भविष्य के लिए हमें भी उनको समाज में बराबरी का अधिकार देना होगा। उनको लिखने-पढ़ने की आजादी देनी होगी। उनको बोलने की आजादी देनी होगी।
उनको साथी चुनने की आजादी देनी होगी। विगत वर्षों में बहुत कुछ बदला है। महिला शिक्षा और महिला सशक्तिकरण की दिशा से लेकर बहुत कुछ बदलना शेष है। विशेष रूप से ग्राम इलाकों में समाज में अभी नारियों की स्थिति संतोषजनक नहीं कही जा सकती हैं। उम्मीद हैं कि आगे चलकर और अपेक्षित बदलाव होगा।
बेटियों को आगे बढ़ाने से मां का ही गौरव बढ़ता है। इसलिए माताओं को अपनी बेटियों को आगे बढ़ाना चाहिए। साथ ही समानता पर ध्यान देने की आवश्यकता हैं, क्योंकि समानता का भाव घर से पैदा होता है। यही होना भी चाहिए। हर परिवार में बहू और बेटी के बीच के अंतर को दूर करने की जरूरत है। महिला दिवस महिलाओं के गौरवपूर्ण संघर्षों के इतिहास की याद दिलाता है।
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