एस. पी. सक्सेना/रांची (झारखंड)। झारखंड में हेमंत सोरेन सरकार के दूसरे कार्यकाल का एक वर्ष पूरा हो गया, लेकिन झारखंडी समाज के बड़े सपने आज भी अधूरे है।
उपरोक्त बाते 28 नवंबर को आदिवासी मूलवासी जनाधिकार मंच के केन्द्रीय उपाध्यक्ष विजय शंकर नायक ने झारखंड में हेमंत सोरेन सरकार के दूसरे कार्यकाल को आज एक वर्ष पूरा होने पर अपनी प्रतिक्रिया में कही। उन्होंने कहा कि राज्य की हेमंत सरकार ने जन-कल्याण और परिवर्तन का साल बताया था, लेकिन ज़मीनी हकीकत कुछ और कहानी कहती है।उन्होंने कहा कि झारखंडी समाज जिन मुद्दों को लेकर दशकों से संघर्ष करता आया है, उनमें से कई पर आज भी निर्णायक कदम दिखाई नहीं देता। सवाल यह है कि झारखंडी जनता के सपनों का राज्य आखिर कब बनेगा।
नायक ने कहा कि शिक्षा के क्षेत्र में सरकार ने बड़े बड़े वादे किये थे मगर बदलाव न के बराबर ही हुआ। सरकार ने राज्य के हज़ारों स्कूलों को मॉडल स्कूल बनाने का दावा किया, लेकिन ग्रामीण इलाकों में शिक्षकों की कमी जस की तस है। आदिवासी–दलित छात्रों की छात्रवृत्ति में अनियमितता, जर्जर स्कूल भवनों की मरम्मत को लेकर कोई ठोस प्रगति नहीं, शिक्षक नियुक्ति प्रक्रिया अभी भी धीमी, झारखंड के बच्चे आज भी वही प्रश्न पूछ रहे हैं कि हम कब बेहतर शिक्षा पाएंगे
उन्होंने कहा कि स्वास्थ्य मामले में ग्रामीण जनता अब भी बेहाल है।
राज्य के बड़े अस्पतालों को अपग्रेड करने की घोषणाओं के बावजूद प्रखंड स्तर के अस्पतालों में डॉक्टर और दवा की भारी कमी है। गांवों में स्वास्थ्य उपकेंद्र केवल नाम मात्र है। गंभीर मरीजों को अब भी रांची या जमशेदपुर के बड़े अस्पतालों पर निर्भर रहना पड़ता है। स्वास्थ्य संरचना में सुधार कागजों पर अधिक और जमीन पर कम दिखता है। कहा कि युवाओं की उम्मीदें टूटी है। सरकार ने रोजगार देने के कई वादे किए थे, लेकिन प्रतियोगी परीक्षाओं की धीमी प्रक्रिया खाली पड़े सरकारी पदों पर नियमित नियुक्ति नहीं।
उद्योग और निवेश के नाम पर कोई बड़ा बदलाव नहीं किया गया, जिसके कारण झारखंड का युवा आज भी बेरोज़गारी से लड़ रहा है और पूछ रहा है सरकार ने हमारा साल कब बदला नायक ने कहा कि सरकार आदिवासी मूलवासी के अधिकार और जल, जंगल और जमीन जैसे संवेदनशील मुद्दे पर चुप्पी साध ली है जो चिंता का विषय है। झारखंड की आत्मा जल, जंगल, ज़मीन है,लेकिन पिछले एक वर्ष में पेसा कानून पूरी तरह लागू नहीं, ग्राम सभाओं का अधिकार सीमित, जमीन अधिग्रहण को लेकर विवाद जारी, सीएनटी-एसपीटी कानूनआदि।
की सुरक्षा पर स्पष्ट नीति नहीं, आदिवासी समाज ने उम्मीद की थी कि अपनी ही सरकार में अधिकार मजबूत होंगे, लेकिन निराशा अधिक दिख रही है। कहा कि खनिज संपदा गई, फायदा नहीं दिखा। आज खनिज संपदा झारखंड की सबसे बड़ी ताकत है।फिर भी खनन पट्टों में पारदर्शिता पर गंभीर सवाल रहिवासियों को रोजगार और लाभ में कमी,
खनन से प्रभावित गांवों में पर्यावरणीय क्षति का समाधान नहीं, झारखंड की मिट्टी निकल रही है, लेकिन स्थानीय बेरोजगारों का जीवन नहीं बदल रहा।
नायक ने कहा कि 1932 की खतियान आधारित स्थानीय नीति, नियोजन निति, आरक्षण का कोटा बढ़ाने वाली आरक्षण नीति, जातीय जनगणना पर आज भी झारखंडी जनता का इंतजार जारी है। ये सब नीतियाँ झारखंडी समाज के झारखंडी पहचान का सबसे बड़ा मुद्दा था। सरकार ने इसे लागू करने की आशा जगाई थी, लेकिन नीति पर कानूनी स्पष्टता नहीं दिखी। लागू करने की समय सीमा नहीं रहा। जनता में भ्रम और असुरक्षा की भावना उत्पन्न हुई। अब झारखंडी समाज को लग रहा है कि यह मुद्दा केवल चुनावी घोषणा बनकर रह गया है। एक वर्ष बीता, सपना अब भी दूर है।
कब पूरा होगा झारखंड का भरोसा हेमंत सोरेन सरकार से झारखंडी समाज को बहुत उम्मीदें थी। रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, पहचान, आदिवासी अधिकार और अपनी जमीन पर हक़। लेकिन दूसरे कार्यकाल का पहला साल इन सपनों को पूरा करने में असफल रहा है। जनता अब सरकार से जवाब चाहती है कि हमारे सपनों का झारखंड कब बनेगा?
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