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श्रीब्रह्मोत्सव श्रीलक्ष्मी नारायण महायज्ञ के तीसरे दिन श्रद्धालुओं ने की यज्ञ मंडप की परिक्रमा

यज्ञ से होता संगतिकरण व आपसी सद्भाव, मैत्री कायम-जगद्गुरु स्वामी लक्ष्मणाचार्य

अवध में किशोर शर्मा/सारण (बिहार)। सारण जिला के हद में नारायणी नदी किनारे साधु गाछी सोनपुर स्थित श्रीगजेंद्र मोक्ष देवस्थानम दिव्य देश नौलखा मंदिर में आयोजित 27 वें श्रीब्रह्मोत्सव सह श्रीमहालक्ष्मी नारायण यज्ञ के तीसरे दिन 29 जनवरी को हजारों की संख्या में श्रद्धालुओं ने यज्ञ मंडप की परिक्रमा की।

इस अवसर पर भगवान श्रीगजेन्द्र मोक्ष भगवान बालाजी वेंकटेश का विश्व मोहिनी स्वरूप का श्रृंगार किया गया। इस स्वरूप का दीदार करने के लिए भक्तों का समूह उमड़ पड़ा।
मौके पर हरिहरक्षेत्र श्रीगजेंद्र मोक्ष देवस्थानम दिव्यदेश पीठाधीश्वर जगद्गुरु रामानुजाचार्य स्वामी लक्ष्मणाचार्यजी महाराज ने कहा कि श्रीब्रह्माजी ने जिस उत्सव को प्रथम बार मनाया उसी उत्सव का नाम ब्रह्मोत्सव पड़ गया।

उन्होंने ब्रह्मोत्सव दर्शन के महत्त्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि जो नर -नारी ब्रह्मोत्सव में रथारूढ़ भगवान के रथ का दर्शन करता है, रथ खींचता है उसका पुनर्जन्म नहीं होता। कहा कि यज्ञ में देव पूजा संगतिकरण और दान का बहुत बड़ा महत्व है। कहा कि संसार की ऐसी कोई संस्था नहीं, जो दान नहीं लेती हो। यज्ञ में संगतिकरण होता है। यज्ञों के द्वारा आपसी सद्भाव, मैत्री कायम होता है। राग – द्वेष एवं ईर्ष्या आदि मिट जाती है। यज्ञ जोड़ने का काम करता है।

उन्होंने कहा कि हमारा सनातन धर्म यज्ञों के ऊपर आधारित है। सतयुग में जब यज्ञ किया गया था उस समय आज की तरह रूपए – पैसे नहीं थे। उस समय ग्रीष्म ऋतु को ईंधन बनाया गया था। शरद ऋतु को हविष्य एवं बसंत ऋतु को घृत। इस प्रकार से यज्ञ का संचालन हुआ। इस तरह यज्ञ की परंपरा आज से नहीं, बल्कि सतयुग से चली आ रही है।

कहा कि यज्ञों के माध्यम से एवं संतों के संगतिकरण के माध्यम से आपसी समझौता हो जाता है। दान दुर्गति नासनम यानी दान दुर्गति का विनाश करने वाला है। प्रथम दान भगवान यज्ञ नारायण को, फिर माता -पिता, पशु पक्षी एवं जरूरतमंदों को जाना चाहिए। सर्वग्रास करनेवाला पाप को खाता है जिससे अंत में उसकी दुर्गति होती है। कहा कि हमारा प्राचीन भारत वर्ष दान के ऊपर टीका है।

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