मचा कोहराम, मृतक के गांव में शोक की लहर
प्रहरी संवाददाता/गिरिडीह (झारखंड)। गिरिडीह जिला के हद में डुमरी थाना क्षेत्र के चीनो रहिवासी उमेश सिंह का शव 25 जनवरी को एंबुलेंस से कोलकाता से उसके घर पहुंचा। शव पहुंचते ही परिवार सहित पूरे गांव में कोहराम मच गया।
जानकारी के अनुसार मृतक उमेश सिंह एफजीवी नामक कंपनी में मलेशिया में मजदूर के रूप में कार्यरत था। जहाँ बीते 12 जनवरी को उसकी मौत हो गई थी। मलेशिया में ही रह रहे उसके साथी मजदूरों ने बीते 13 जनवरी को दूरभाष पर परिजनों को सूचना दी कि उमेश की मौत हो गई हैं। इस बात की जानकारी मिलते ही गांव में उदासी छा गई और परिजनों का रो-रोकर बुरा हाल हो गया था।
परिवार के सदस्य तभी से शव आने के इंतजार में एक-एक पल मुश्किल से गुजार रहे थे। लगभग 13 दिनों बाद मलेशिया से जैसे ही शव उसके घर पहुंचा, पूरा गांव उमेश के घर के दरवाजे पर उमड़ पड़ा। परिजनों के चीत्कार से पूरा माहौल गमगीन हो गया। पिछले 13 दिनों से पति के पार्थिव शरीर के इंतजार में बैठी पत्नी शव को देखकर दहाड़े मारकर रोने लगी। वह बार-बार यही कह रही थी कि अब किसके सहारे जीवन गुजरेगा। उनके आंखों से आंसू थमने का नाम नहीं ले रहा था।
उनके एक ही शब्द सभी को रुला दे रहे थे कि हम केकर बिगडले रहनी हा। अब हमनी के केकरा सहारे रहब। किसी के समझाने का उस पर कोई असर नहीं हो रहा था। हालांकि चंद मिनट बाद ही बेहोश होकर गिर पड़ी। वहां जितने रहिवासी थे, सभी की आंख नम हो गयी। सबको यही चिंता सता रही थी कि मृतक के बच्चियों की शादी और बच्चे का परवरीश कैसे होगा।
ज्ञात हो कि, मृतक उमेश सिंह अपने पीछे पत्नी और पुत्री किरन कुमारी (17 वर्ष), पूजा कुमारी (13) तथा पुत्र पप्पू कुमार (15) को छोड़ गया है। घटना की खबर मिलते ही परिवार में मातम पसर गया है और गांव में भी शोक की लहर है। प्रवासी मजदूरों के हित में कार्य करने वाले समाजसेवी सिकंदर अली ने मृतक के घर पहुंचकर गहरी संवेदना जताते हुए कहा कि झारखंड की यह कोई पहली घटना नहीं है।
इससे पहले भी झारखंड के कई प्रवासी मजदूरों ने विदेशों में अपनी जान गंवाई है। गौरतलब है कि, झारखंड के हजारों मजदूर आजीविका की तलाश में विदेशों में तथा देश के अन्य राज्यों का रुख करते हैं, जहां उनके लिए हालात बेहद चुनौतीपूर्ण रहता है। सिकंदर अली के अनुसार कुछ दिनों पूर्व झारखंड के बोकारो, गिरिडीह और हजारीबाग जिले के सैकड़ो मजदूर मलेशिया और कैमरून में फंसे हुए थे।
जिनकी वापसी बहुत ही मुश्किल से हो पाई है। ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर कब तक झारखंड के युवा परदेस में जान गंवाते रहेंगे? ऐसे में सरकार को चाहिए कि राज्य में ही रोजगार की ठोस व्यवस्था करे, ताकि मजदूरों को पलायन के दर्द से बचाया जा सके।
![]()













Leave a Reply