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13 मार्च तक चलेगी दशा माता की पूजा

सूर्य देवता के बाद पीपल के वृक्ष की होगी पूजा

मुश्ताक खान/मुंबई। होलिका दहन के दूसरे दिन प्रारंभ होने वाले दशा माता त्यौहार के पावन पर्व को मनीष विजय सोसायटी में श्रद्धा पूर्वक महिलाओं ने मनाया। दस दिनों के महापर्व में शीतला सप्तमी/अष्टमी का विशेष महत्व होता है।

दशा माता के अनुयाइयों ने सुबह और शाम दोनों पहर परंपरिक और प्रामाणिक तौर पर माता को प्रसन्न करने में कोई कोर कसार नहीं छोड़ते। शीतला सप्तमी माता की पौराणिक कथा के अनुरूप वाशी नाका के मनीष विजय सोसायटी में रहने वाली धार्मिक विचारों वाली महिलाओं ने इस परंपराओं को पूरा करने का हर संभव प्रयास किया। इनमें सविता शर्मा ,रेखा मेहता, उषा जैन, भाग्यश्री श्रीमाली और अनीता शर्मा के अलावा अन्य सोसायटी की महिलाओं का समावेश है।

गौरतलब है कि चेंबूर के आर सी मार्ग पर स्थित वाशी नाका के मनीष विजय सोसायटी में श्रद्धा पूर्वक दशा माता की पूजा अर्चना की गई। इस अवसर पर जैन समाज से जुड़े माता के अनुयाइयों द्वारा 13 मार्च यानि पूजा अंतिम दिन सूर्य देवता की पूजा के बाद पीपल के वृक्ष की पूजा की जाएगी। दशा माता की पूजा महिलाओं के लिए काफी अहम माना जाता है। इस पूजा की विशेषताओं में शीतला सप्तमी की व्रत रखना अनिवार्य होता है, तभी पूजा का पूर्ण फल मिलेगा। दशा माता के अनुयाइयों ने सुबह और शाम दोनों पहर परंपरिक और प्रामाणिक तौर पर माता को प्रसन्न करने में कोई कोर कसार नहीं छोड़ी। सोसायटी में रहने वाली भाग्यश्री श्रीमाली ने बताया कि धार्मिक विचारों वाली महिलाओं ने इन परंपराओं को पूरा करने का हर संभव प्रयास किया।

शीतला सप्तमी/अष्टमी की पौराणिक कथा के अनुसार, एक बार माता शीतला पृथ्वी पर देखने आईं कि उनकी पूजा कौन करता है। किसी ने उन्हें गर्म भोजन दिया, जिससे वे कुपित हो गईं। फिर एक कुम्हारिन ने ठंडा बासी भोजन व दही खिलाकर माता को शांत किया, जिससे माता ने उसके परिवार को सुख-समृद्धि का आशीर्वाद दिया। कुम्हारिन की कहानी: एक गांव में एक बुढ़िया रहती थी, जो शीतला अष्टमी का व्रत करती थी और ठंडा खाना खाती थी। एक बार माता ने उसकी परीक्षा ली, लेकिन बुढ़िया ने पूरी श्रद्धा से शीतला माता की पूजा की और उन्हें ठंडा भोजन भोग लगाया, जिससे माता प्रसन्न हो गईं। एक अन्य कथा के अनुसार, एक सास और उसकी दो बहुओं ने शीतला अष्टमी के दिन बासी भोजन करने के नियम का पालन नहीं किया। उन्होंने सोचा कि इससे बच्चे बीमार हो सकते हैं, इसलिए उन्होंने ताजा खाना बना लिया, इससे माता शीतला नाराज हो गईं।

क्षमा और वरदान: बाद में अपनी गलती का एहसास होने पर, दोनों बहुएं माता से क्षमा मांगती हैं। शीतला माता उनकी सच्ची भक्ति से प्रसन्न होकर बच्चों को पुनर्जीवित कर देती हैं और आशीर्वाद देती हैं। इस कथा से यह शिक्षा मिलती है कि चैत्र कृष्ण पक्ष की अष्टमी (या सप्तमी) को माता को ठंडा भोजन या बसौड़ा चढ़ाकर उनकी पूजा करनी चाहिए। इस दिन ताजा खाना नहीं बनता और घर में सुख, समृद्धि व स्वास्थ्य बना रहता है।

Tegs:# The worship of Dasha Mata will continue till March 13.


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