मेले के आरंभ काल से खिलौने में होती है इसकी गिनती
अवध किशोर शर्मा/सारण (बिहार)। हरिहरक्षेत्र सोनपुर मेले के आरंभिक दौर के खिलौने में शामिल मिट्टी की सिटी और मिट्टी की घिरनी को देखकर मेला दर्शकों को अपने बचपन की यादें ताजा हो रही हैं। चार से पांच दशक पूर्व मेले की शान रही मिट्टी की सिटी और घिरनी आज मेले के विभिन्न बाजारों में बिक्री के लिए उपस्थित बेशकीमती और रंग बिरंगे खिलौने के बीच अपने वजूद को बनाए है, यह कम बड़ी बात नहीं है।
हरिहर क्षेत्र मेला में आए बच्चों की पहली पसंद मिट्टी की सिटी और घिरनी की उपस्थिति मेले के हर नुक्कड़ तथा सड़क किनारे देखी जा रही है। इसे बेचने वालों में बालक, युवा, बुजुर्ग, महिला और पुरुष सभी शामिल हैं। अभी मेले में मिट्टी की सिटी और मिट्टी की घिरनी खिलौने की संख्या लगभग पांच दर्जन है।
सच कहा जाये तो इस तेज रफ्तार के समय में जब इस मेले में एक से बढ़कर एक खिलौने बच्चों के मनोरंजन के लिए मौजूद है और उनकी खरीद बिक्री भी हो रही है। वहीं, इन अनगिनत प्रकार के बेशकीमती खिलौनों के बीच मिट्टी की बनी काली सिटी और घिरनी बेंचनेवाले मिट्टी पर ही बैठकर इनकी बिक्री भी कर रहे हैं।
सोनपुर मेला का सबसे पुराना खिलौना है मिट्टी की सिटी और घिरनी
हरिहर क्षेत्र मेले में बिक्री हो रही सिटी और घिरनी सबसे पुराना खिलौना है। कहते हैं कि जबसे बाबा हरिहरनाथ का मंदिर है, तबसे ही इस मिट्टी के खिलौने की बिक्री होती रही है। सबसे बड़ी बात यह कि इन दोनों खिलौनों की बिक्री ज्यादातर इसी मेले में होती है। इसकी कीमत भी बेहद कम है।
चिड़िया बाजार मार्ग में सारण जिला के हद में शीतलपुर बस्ती जलाल के विक्रेता उजीद आलम इन खिलौनों को बेंच रहे हैं। उनका कहना है कि वषों से इस मेला में मिट्टी का खिलौना बेंचते आ रहे हैं।बिक्री कुल मिलाकर ठीक है। उन्होंने बताया कि 10 रुपए में चार सिटी और 10 रुपए में चार घिरनी की बिक्री कर रहे हैं।
निकट ही रेलवे ओवरब्रिज के नीचे उसी गांव की महिला भी मिट्टी के खिलौने उसी दाम पर बेंच रही है। थोड़ी दूर पर बैठा एक बालक भी खिलौना बेंच रहा है। वह भी बस्ती जलाल का ही है। पहले मेला घूमने आनेवाले इन खिलौनों को बाबा हरिहरनाथ और छत्तर मेला का सगुण मानकर इसे खरीद कर अपने घर ले जाते थे। सदियों पूर्व इस खिलौना का रंग काला था और आज भी इसका रंग ठीक वैसा ही काला है।
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