एस.पी.सक्सेना/गिरिडीह (झारखंड)। श्री जैन श्वेतांबर सोसायटी के तत्वावधान गिरिडीह जिला के हद में मधुवन स्थित पाश्वर्यनाथ सम्मेत शिखरजी महातीर्थ के प्रांगण में पर्युषण पर्व को लेकर 5 सितंबर को भव्याराधना का आयोजन किया गया। यहां साध्वी डॉ. प्रियवंदनाश्री ने अपने संबोधन में बताया कि पांच सूत्र अपनाने से समाज में हमेशा शांति बनी रहेगी।
उन्होंने कहा कि शांति श्री कल्पसूत्र जैन जगत का हार्ट है। रिड्ढे की हड्डी है। जैन धर्मावलम्बियों के लिए आदरणीय श्रवणनीय एवं ऐसा सुन्दर सुविशिष्ट प्रेरणादायी है। 16 शताब्दी के इस काल में कल्पसूत्र की रचना की गयी।
तब देवधिगणि क्षमाश्रमण ने अपनी स्मृति क्षीणता का अनुभव किया, वीतराग वाणी की सुरक्षा की दृष्टि से लेखन के अपवाद को विधान किया (जैनखे. मूर्ति समाज में सर्वाधिक सम्मान आदर प्राप्त हुआ।
सर्वाधिक प्रचार -प्रसार कल्पसूत्र का हुआ। ध्रुवसेना के समय से चतुर्विध संघ के समक्ष कल्पसूत्र की वांचना प्रारम्भ हुयी। आठवें दिन मूल पाठ का वाचन किया जाता है।
साध्वी डॉ प्रियकताश्री जी ने संबोधित करते हुए कहा कि नवकार महामंत्र शाश्वत मंत्र है। नवकारमंत्र के प्रभाव से सर्प के स्थान पर फूल हार, हीरों का आभूषण, सुन्दर परिधान हो जाता है। उन्होंने कहा कि सभी अपने जीवन में क्षमा, मैत्री, करुणा, प्रमोद, तोरण सजाये। मैत्री के व्यवहार से संघटन की रचना करें।
परिवार को जोड़कर चले। इसे टूटने न दें। इसी आधार पर परिवार, घर को स्वर्ग बनाए। उन्होंने कहा कि पांच सूत्र को अपनाने से हीं घर, परिवार, समाज और मानव जाति में शांति कायम रहेगा।
वे पंच सूत्र है समय का ध्यान रखना, क्षमा मांगना, कृपया अथवा प्लीज कहना, धन्यवाद देना और हमेशा किसी भी परिस्थिति में चेहरे पर मुस्कुराहट बनाये रखना। इस अवसर पर जैन समाज के अनिलजी दुगडा, मीडिया प्रभारी हरीष दोशी उर्फ राजुभाई ने सभी कार्यकताओं एवं आगंतुकों को साधुवाद दिया।
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