कई मायनो में महत्वपूर्ण हैं भोक्ता पर्व

रंजन कुमार वर्मा/कसमार (बोकारो)। झारखंड में मनाया जानेवाले भगता या भोक्ता पर्व का सांस्कृतिक, धार्मिक, ऐतिहासिक और वैज्ञानिक पहलू है। सांस्कृतिक दृष्टि से इस पर्व का बहुत ही महत्वपूर्ण है। यह पर्व गर्मी के मौसम में होती है।

कुड़माली संस्कृति में किसी के यहां मृत्यु हो जाने पर इसके गोतिया सहित आस पड़ोस के घर परिवार के सदस्य उसके शोक में रहते हैं। ऐसे ही शोक इस पर्व के समय पूरे बाइसि के रहिवासी मानते हैं। इस कारण इस पर्व के एक सप्ताह पहले से उस बाईसि में किसी के घर पर मांसाहारी भोजन नहीं बनाया जाता है। यहां तक प्याज, लहसुन आदि का सेवन करना निषेध रहता है।

इसके पूर्व किसी भी प्रकार का मौसमी फल का सेवन नहीं करना होता हैं। जैसे इस मौसम में होने वाले आम, चना, ककड़ी, खीरा आदि। इस कारण जो इस पर्व को करते हैं, वे चना एवं आम का सेवन नहीं करते हैं।

इस समाज में प्रचलित छउ नृत्य की शुरुआत इसी भगता पर्व के गाजन के दिन से ही की जाती है। इसमें बजने वाला ढाक के धुन आढ़ई काठि का होता है। यह एक विशेष प्रकार का धून होता है, जो केवल इसी अवसर पर बजाया जाता है।

धार्मिक दृष्टि से कुड़माली संस्कृति में किसी भी नई फसल के आने पर उसे सबसे पहले आदि देव यानी बूढ़ा बाबा को अर्पण करने के पश्चात इसका सेवन करना अपना धर्म समझते हैं। इस कारण गर्मी के मौसम में फलने वाले फल जैसे चना, आम, खीरा, ककड़ी आदि को उस मड़प थान स्थित बूढ़ा बाबा को चढ़ाते हैं।

ऐतिहासिक दृष्टि से इसका संबंध एक वीर योद्धा राजा से है। ये राजा बहुत ही बलवान, वीर एवं कुशल योद्धा थे। इस योद्धा को बाहरी आक्रमणकारी द्वारा बहुत ही चतुराई एवं साहस से पकड़कर बंदी बनाया गया, परंतु इसे मारना इतना आसान नहीं था। इस कारण किसी तरह से उसे रस्सी में बांधा गया।

फिर आक्रमणकारियों द्वारा उसके शरीर पर लोहे की कील गाड़ कर उसी बूढ़ा बाबा के नजदीक छोड़ दिया गया। इसके बावजूद ये दो दिन तक मरा नहीं। अंत में इसके शरीर में सुआ से छिद्र कर उसे उस तरह से खुंटा में बांध कर कई दिनों तक चक्र लगाता रहा। अंततः उसे इस तरह का कठोर सजा देने के उपरांत उसकी मृत्यु हो गयी।

इसी के यादगार में कुड़माली समुदाय के रहिवासी भगता पर्व करते हैं एवं अपने शरीर में सुआ से छिद्र कर उसी तरह चरखा के ऊपर घुमाते हैं। वैज्ञानिक दृष्टि से इसमें प्रयोग लोहे के सुआ से पीठ, छाती, हाथ-पैर के चमड़े पर छिद्र कर घुमाया जाता है।

इसके बावजूद इससे सेप्टिक नहीं होता, क्योंकि इस लोहे को एक विशेष प्रकार से भट्ठी पर गलाकर बनाया जाता है। इसमें जंगरोधक तत्व चढ़ाया जाता है। इसे छेद करने के साथ ही उस पर सिंदूर लगाया जाता है। सिंदूर एक प्रकार का एंटीसेप्टिक के रूप में प्रयोग किया जाता है। ऐसा करने पर भगतिआ को किसी प्रकार का सेप्टिक नहीं पकड़ता और भगतिआ बेहिचक अपने शरीर में कांटा छिदवाते हैं। अतः भगता पर्व कई दृष्टि से महत्वपूर्ण है।

इस तरह व्रत आधारित पर्व-त्यौहारों में प्रमुख रूप से भगता, मनसा, करम, जितिआ आदि पर्व इस संस्कृति के माननेवाले मनाते हैं। यह इनके लोक जीवन में कई दृष्टि से महत्वपूर्ण। इन पर्व-त्यौहार में इनके जीवन जीने की शैली, ज्ञान-दर्शन, कला एवं विज्ञान समाहित है।

इन व्रत आधारित पर्वों को करने से उनके बीच में आत्मबल, दृढ़ संकल्प, आत्मविश्वास से कोई भी कार्य करने का न केवल बल मिलता है, बल्कि इनके अंदर एक ईमानदार विचारधारा का सृजन होता है। यह विश्व के मानव सभ्यता के लिए सर्वश्रेष्ठ एवं सर्वोत्तम नीति है, जो कुड़माली संस्कृति में आदिकाल से धरोहर के रूप में इसे अपनाये हुये हैं।

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