एस. पी. सक्सेना/रांची (झारखंड)। झारखंड के सारंडा मे अश्रायनी बनाने के पहले राज्य में बने पूर्व के 9 आश्रायनी के प्रभावित विस्थापितों को राज्य की हेमंत सरकार 6,000 करोड़ राशी क्षतिपूर्ती का भुगतान करे अन्यथा वन्य जीव (सरंक्षण) अधिनियम 1972 के धारा 18A(1) के अब तक उलंघन होने पर उच्च न्यायालय पर केस किया जायेगा।
उपरोक्त बाते 25 अक्टूबर को आदिवासी मूलवासी जनाधिकार मंच के केन्द्रीय उपाध्यक्ष विजय शंकर नायक ने झारखंड की राजधानी रांची के हटीया स्थित अपने कार्यालय में कही। उन्होंने कहा कि नई सेंचुरी सारंडा बनाने से पहले ही पूर्व प्रभावित विस्थापित परिवारों को 6,000 करोड़ राशी क्षतिपूर्ती का भुगतान देना अनिवार्य होगा, तब ही सेंचुरी सारंडा बनाने की दिशा में कारवाई करनी होगी। नही तो सरकार की फजीहत झारखंड उच्च न्यायालय में होना तय है।
नायक ने कहा कि झारखंड में बने पूर्व के 9 आश्रायनी में वन्य जीव (सरंक्षण) अधिनियम 1972 के धारा 19 से 25 तक कोई कारवाई कभी नही की गई, न ही कभी धारा 26 के अधीन अंतिम रूप से किसी आश्रायनी अधिसूचना निर्गत ही की गई है और न ही 18A(1) के अंतर्गत विस्थापितों के प्रभावित परिवार को आवश्यकताओ की ही पूर्ति की गयी है।
उन्होंने कहा कि धारा 19 से 25 के अंतर्गत कोई कारवाई नही किये जाने एवं 9 आश्रायनी के विस्थापितों के प्रभावित परिवार को उनके हक़ से वंचित किये जाने के कारण वर्ष 2003 में केंद्र की अटल बिहारी बाजपेयी सरकार द्वारा वाइल्ड लाइफ प्रोटेक्शन एक्ट 1972 में संसोधन कर धारा 18 (2) जोड़ी गई, जिसमे अंतिम अधिसूचना धारा 26 के अन्तर्गत प्रकाशित होने तक उन विस्थापितों के प्रभावित परिवार के मवेशियों के लिए चारा, जलावन एवं अन्य वन आधारित उनके हको को सरकार के द्वारा मुफ्त मुहैया कराने का आदेश है। मगर झारखंड सरकार या वन विभाग ने कभी भी इस पर ध्यान नही दिया और धारा 18 (2) का अनुपालन नही किया।
नायक ने कहा कि मोटे तौर से आज लगभग 30 लाख रहिवासी उन आश्रयानी वनों पर आश्रित है जो 6 लाख परिवार माने जा सकते है। कहा कि पिछले 50 वर्षो में और प्रति परिवार ₹20,000 प्रतिवर्ष की आवश्यकता होने पर यह राशी 6,000 हजार करोड़ आती है, जो विस्थापित प्रभावित ग्रामीणों का सरकार पर बकाया है। इस बीच भारत सरकार ने इको-सेंसिटिव जोन की अधिसूचना उन सभी 9 आश्रयणीयों के लिए कर दी है।
दलमा आश्रयणी के लिए यह एस.ओ. 680(E) दिनांक 2012 एरिया: 522.98 है। इससे और भी ज्यादा रहिवासी ग्रामीणों के हक प्रभावित हो रहे है। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि अगर सरकार इन प्रभावित विस्थापितों के परिवारों को क्षतिपूर्ती के रूप में ₹6,000 करोड़ राशी का भुगतान नही किया जाता है तो केंद्र एवं राज्य सरकार को तथा वन विभाग को उच्च न्यायालय मे पार्टी बना कर केस किया जायेगा।
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