एस. पी. सक्सेना/रांची (झारखंड)। ईरान युद्ध संकट के दौर में अमेरिका का लाइसेंस से भारत की संप्रभुता का अंतिम संस्कार हो रहा है। जब तक भारत तेल के लिए विदेशी लाइसेंस पर निर्भर रहेगा, तब तक भाजपा का आत्मनिर्भर भारत सिर्फ नारा हीं रहेगा। उक्त विचार झारखंड कांग्रेस के वरिष्ठ नेता विजय शंकर नायक के है।
नायक ने 8 मार्च को बताया कि बीते 6 मार्च को अमेरिकी ट्रेजरी विभाग के ऑफिस ऑफ फॉरेन एसेट्स कंट्रोल (ऑफक) ने रूस-संबंधित जनरल लाइसेंस 133 जारी किया। यह एक साधारण कागज का टुकड़ा नहीं था। यह भारत की ऊर्जा सुरक्षा, विदेश नीति और संप्रभुता पर एक खुला तमाचा था। उन्होंने कहा कि दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल आयातक देश भारत, जो प्रतिवर्ष लगभग 300 मिलियन टन कच्चा तेल खरीदता है, अब रूस से पहले से लोड हो चुके तेल को खरीदने के लिए अमेरिका से 30 दिनों की अनुमति मांग रहा है। यह लाइसेंस बीते 5 मार्च को दोपहर 12:01 बजे ईएसटी से पहले जहाजों पर लोड किए गए रूसी क्रूड और पेट्रोलियम उत्पादों की डिलीवरी और बिक्री को भारतीय बंदरगाहों पर अनुमति देता है, लेकिन केवल आगामी 4 अप्रैल तक। उसके बाद? फिर से अमेरिका के दरवाजे पर खड़े होना पड़ेगा। यह घटना सिर्फ एक अस्थायी राहत नहीं, यह 21वीं सदी की सबसे बड़ी विडंबना है।
नायक ने कहा कि एक ओर भारत विश्व गुरु बनने का दावा करता है, दूसरी ओर देश की अर्थव्यवस्था और ऊर्जा सुरक्षा एक महाशक्ति के हाथों में कैद हो जाती है। यूक्रेन युद्ध के बाद रूस पर लगे प्रतिबंधों ने वैश्विक ऊर्जा बाजार को हिला दिया था, लेकिन ईरान युद्ध ने स्थिति को और भयावह बना दिया। होर्मुज जलडमरूमध्य प्रभावी रूप से बंद हो गया। 200 से ज्यादा जहाज फंस गए, जिनमें 38 भारतीय जहाज शामिल हैं। मध्य पूर्व से तेल की सप्लाई लगभग ठप हो गई। ऐसे में अमेरिका ने मानवीय आधार पर यह वेवर जारी किया, लेकिन असल मकसद क्या है? नायक के अनुसार वैश्विक बाजार में तेल बहता रहे या भारत को अपनी जगह याद दिलाई जाए कि वह अभी भी स्वतंत्र नहीं है?
रूस-भारत तेल संबंध नायक के अनुसार एक दशक की यात्रा और वर्तमान संकट भारत और रूस के बीच ऊर्जा सहयोग की जड़ें सोवियत काल में हैं। वर्ष 2021 में भारत रूस से मात्र 2 प्रतिशत तेल आयात करता था। वर्ष 2022 में यूक्रेन युद्ध के बाद पश्चिमी प्रतिबंधों ने रूस को डिस्काउंट पर तेल बेचने के लिए मजबूर किया। भारत ने इस अवसर का फायदा उठाया। वर्ष 2023 तक रूस भारत का सबसे बड़ा तेल आपूर्तिकर्ता बन गया। सकल जरूरत का 40 प्रतिशत से ज्यादा हिस्सेदारी के साथ। वर्ष 2024 में भारत ने रूस से लगभग 52.73 बिलियन डॉलर का क्रूड आयात किया। लेकिन वित्तीय वर्ष 2025-26 में अमेरिकी दबाव बढ़ा।
अमेरिका ने रूसी तेल कंपनियों पर नए प्रतिबंध लगाए। 25 प्रतिशत पेनल्टी टैरिफ थोपे और भारत को रूसी तेल कम करने के लिए मजबूर किया। जनवरी 2026 में रूस से आयात 44 महीने के निचले स्तर पर पहुंच गया। कहा कि मात्र 19.3 प्रतिशत हिस्सेदारी। फरवरी में यह 1.042 मिलियन बैरल प्रति दिन रहा, जबकि कुल आयात 5.3 मिलियन बैरल प्रतिदिन तक पहुंच गया।
उन्होंने बताया कि सऊदी अरब, इराक और यूएई ने हिस्सेदारी बढ़ाई। लेकिन ईरान युद्ध ने सब बदल दिया। होर्मुज स्ट्रेट बंद होने से मध्य पूर्वी तेल की कीमतें आसमान छूने लगीं। भारत के पास विकल्प सीमित थे। या तो महंगे अमेरिकी/गल्फ तेल खरीदो, या रूसी तेल जो पहले से समुद्र में तैर रहा है। अमेरिका ने ठीक यही मौका देखा और 30 दिनों का लाइसेंस दे दिया। नायक ने कहा कि ट्रेजरी सेक्रेटरी स्कॉट बेसेंट ने एक्स पर लिखा है कि तेल को वैश्विक बाजार में बहते रहने के लिए… भारतीय रिफाइनरियों को रूसी तेल खरीदने की अस्थायी 30-दिवसीय छूट। लेकिन यह छूट केवल उन जहाजों के लिए है जो 5 मार्च से पहले लोड हो चुके थे। नए शिपमेंट्स नहीं। यह एक स्टॉप गैप है, जो भारत को 30 दिनों के लिए राहत देता है, लेकिन लंबे समय में निर्भरता बढ़ाता है।
आर्थिक प्रभाव: अरबों की बचत या अमेरिकी जाल? नायक के अनुसार रूसी तेल भारत के लिए वरदान रहा है। प्रतिबंधों के कारण रूस 7-12 प्रतिशत सस्ता तेल बेचता रहा। वर्ष 2025 में भारत ने अरबों डॉलर बचाए। लेकिन अब स्थिति उलट गई है। अमेरिकी दबाव से रूसी हिस्सेदारी घटकर 20-30 प्रतिशत रह गई। इस वेवर से भारतीय रिफाइनरियां (जैसे आईओसी, बीपीसीएल , रिलायंस) उन कार्गो को खरीद सकेंगी जो पहले प्रतिबंधों के कारण अटके थे। लेकिन 30 दिनों बाद क्या? अगर वेवर नवीनीकृत नहीं हुआ, तो भारत को महंगे विकल्प चुनने पड़ेंगे। तेल कीमतें पहले ही बढ़ रही हैं। ईंधन, परिवहन, खाद्य सब महंगा होगा। मुद्रास्फीति बढ़ेगी, रुपया कमजोर होगा। भारतीय कंपनियां अमेरिकी प्रतिबंधों का उल्लंघन करने पर जुर्माने का जोखिम उठा रही हैं।
रिफाइनरियां कानूनी राय ले रही हैं। एक ओर ऊर्जा सुरक्षा, दूसरी ओर अमेरिकी दंड का डर। नायक के अनुसार यह वेवर भारत की बहुपक्षीय विदेश नीति पर सबसे बड़ा सवाल खड़ा करता है। भारत हमेशा कहता आया है कि वह किसी की गुलाम नहीं है। न रूस का न अमेरिका का। लेकिन जब ऊर्जा सुरक्षा दांव पर लगे, तो लाइसेंस लेना पड़ता है। क्या यह आधुनिक गुलामी नहीं? एक संप्रभु राष्ट्र को अपनी जरूरत पूरी करने के लिए वाशिंगटन से परमिशन लेनी पड़ रही है।
अमेरिका की रणनीति साफ है कि ईरान युद्ध में रूस को अलग-थलग रखना, लेकिन वैश्विक अर्थव्यवस्था को क्रैश होने से बचाना। भारत को इस्तेमाल किया जा रहा है। बीजेपी इसे पीएम मोदी की रणनीतिक तेल कूटनीति की सफलता बता रही है, लेकिन आलोचक कहते हैं कि यह अमेरिका के सामने घुटने टेकना है। कांग्रेस और अन्य विपक्षी इसे राष्ट्रीय अपमान कह रहे हैं।
उन्होंने कहा कि यह 30-दिवसीय वेवर अस्थायी है, लेकिन समस्या स्थायी। भारत को ऊर्जा सुरक्षा के लिए तीन रास्ते अपनाने होंगे:
नवीकरणीय ऊर्जा पर जोर: सौर, पवन, हाइड्रोजन निर्भरता कम करने का एकमात्र स्थायी रास्ता। वेनेजुएला, अफ्रीका, अमेरिका से आयात बढ़ाएं, लेकिन महंगे पड़ेंगे। ब्रिक्स, एससीओ जैसे मंचों पर प्रतिबंधों के खिलाफ आवाज बुलंद करें। नायक ने कहा कि यह घटना हमें सिखाती है कि संप्रभुता सिर्फ झंडा फहराना नहीं आर्थिक स्वतंत्रता है। जब तक भारत तेल के लिए विदेशी लाइसेंस पर निर्भर रहेगा, तब तक आत्मनिर्भर भारत सिर्फ नारा रहेगा। कहा कि क्या हम इस जंजीर को तोड़ पाएंगे या 30 दिनों की गुलामी को स्थायी बना लेंगे? समय बताएगा, लेकिन आज का सच कड़वा है। भारत की संप्रभुता भांड़ में गई है।
![]()













Leave a Reply