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अनंत व्रत की लुप्त होती लोक-संवाद: का मथत बाड़ू, खीर सागर में छिपा भक्ति दर्शन

अवध किशोर शर्मा/सारण (बिहार)। भाद्रपद शुक्लपक्ष चतुर्दशी को मनाया जाने वाला अनंत व्रत 25 सितंबर को पूरे सारण जिला में पवित्रता के साथ संपन्न हो गया। इस अवसर पर श्रद्धालू महिलाओं ने भक्ति भाव से अनंत व्रत की कथा का श्रवण कर व्रत पूर्ण की।

जिला के हद में सोनपुर स्थित विश्व प्रसिद्ध बाबा हरिहरनाथ मंदिर न्यास के मुख्य अर्चक आचार्य सुशील चंद्र शास्त्री ने अनंत व्रत की महत्ता बताते हुए कहा कि यह व्रत केवल 14 गांठ वाले अनंत सूत्र का व्रत नहीं है, बल्कि इसमें एक अनोखी मौखिक परंपरा भी जीवित है। कहा कि व्रत के दौरान महिलाओं के बीच बोला जाने वाला भोजपुरी संवाद का मथत बाड़ू! खीर सागर। का ढूंढत बाड़ू! अनंत भगवान। मिललें? ह मिललें। माथे चढ़ाव। चढ़इनी। आज भी इस व्रत की आत्मा माना जाता है।

उन्होंने कहा कि यह संवाद दिखने में साधारण है, पर पूजा की दृष्टि से इसमें भक्ति के चार चरण समाहित है। वे बताते है कि पहला चरण है जिज्ञासा। का मथत बाड़ू! खीर सागर का अर्थ है मन का मंथन। जैसे देवताओं ने अमृत के लिए क्षीर सागर का मंथन किया था, वैसे ही व्रती अपने जीवन और मन का मंथन करती है।

उन्होंने बताया कि दूसरा चरण है लक्ष्य का निर्धारण। का ढूंढत बाड़ू! अनंत भगवान। इसमें व्रती स्पष्ट करती है कि उसका अंतिम लक्ष्य धन या सुख नहीं, बल्कि आदि-अंत से परे भगवान विष्णु के अनंत स्वरूप को पाना है, जो क्षीर सागर में निवास करते हैं। तीसरा चरण है साक्षात्कार। मिललें? ह मिललें। यह व्रत की सफलता और ईश्वर कृपा की अनुभूति का प्रतीक है। यह विश्वास दिलाता है कि सच्चे मन से की गई खोज व्यर्थ नहीं जाती।

और अंतिम चरण है समर्पण। माथे चढ़ाव। चढ़इनी। माथा शरीर का सर्वोच्च स्थान है। भगवान को माथे पर चढ़ाने का अर्थ है, अपने अहंकार से ऊपर उठकर परमात्मा को अपने जीवन के सर्वोच्च स्थान पर स्थापित करना। स्थानीय पंडितों का कहना है कि बिना इस प्रश्नोत्तर संवाद के अनंत व्रत की कथा अधूरी मानी जाती है। यह परंपरा बिहार के लोक-जीवन में वेदों के गूढ़ ज्ञान को सरल भाषा में आम जनों तक पहुंचाने का सशक्त उदाहरण है।

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