एस. पी. सक्सेना/रांची (झारखंड)। कर्ज के पहाड़ पर खड़ा नया भारत क्या विकास की चमक के पीछे छिपा रहा है भारत का कर्ज का साम्राज्य? मोदी सरकार की अर्थनीति का सच है अच्छे दिन या कर्ज का दिन। उक्त विचार झारखंड के वरिष्ठ कांग्रेसी नेता विजय शंकर नायक के।
नायक के अनुसार वर्ष 2014 में जब नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी ने देश की सत्ता संभाली, तब देश के सामने एक नया राजनीतिक नारा रखा गया नया भारत, अच्छे दिन और मजबूत अर्थव्यवस्था। उस समय बार-बार कहा गया कि पिछली सरकार, जिसे डॉ मनमोहन सिंह के नेतृत्व में कांग्रेस गठबंधन की सरकार चल रही थी, उसने देश को आर्थिक रूप से कमजोर कर दिया है। लेकिन एक दशक बाद आज देश के सामने बड़ा सवाल है कि क्या भारत वास्तव में आर्थिक रूप से मजबूत हुआ है या देश तेजी से कर्ज के पहाड़ पर चढ़ता जा रहा है?
नायक ने बताया कि सरकारी बजट और आर्थिक रिपोर्टों के आंकड़े बताते हैं कि भारत का कुल सार्वजनिक कर्ज लगातार बढ़ रहा है। डेटा व् विश्लेषण के अनुसार वर्ष 2004 के आसपास भारत का कुल सरकारी कर्ज लगभग 17 लाख करोड़ रुपये था। वर्ष 2014 तक यह बढ़कर लगभग 55 लाख करोड़ रुपये हो गया। यह वृद्धि जरूर हुई, बावजूद इसके तब भारत की जीडीपी भी तेजी से बढ़ रही थी। कई वर्षों तक भारत की विकास दर 7 से 8 प्रतिशत रही। उन्होंने कहा कि जब सरकारी कर्ज बढ़ता है तो उसका बोझ अंततः आमजनों पर ही पड़ता है।
उन्होंने बताया कि वर्ष 2014 के आसपास प्रति भारतीय नागरिक कर्ज लगभग 40 से 45 हजार रुपये था। आज मोदी की भारतीय जनता पार्टी के कार्यकाल में प्रति नागरिक कर्ज एक लाख रुपये से अधिक हो चुका है, जो देश की जनता के लिए चिंता का विषय है। इसका मतलब है कि एक नवजात बच्चा भी जन्म लेते ही सरकारी कर्ज का बोझ लेकर आता है।
नायक ने कहा कि कांग्रेस के समय के दौर में कर्ज लेकर कई सामाजिक और आर्थिक योजनाएं लागू की गई, जो देश हित और देश की जनता के हितो को केंद्र बिंदु में रख कर बनाये गये थे। ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना, शिक्षा का अधिकार, ग्रामीण सड़क योजना, ग्रामीण विकास योजना, स्वास्थ्य मिशन, बैंकिंग विस्तार, सुचना का अधिकार, खाद्य सुरक्षा का अधिकार आदि योजनाओं ने ग्रामीण अर्थव्यवस्था और गरीब वर्गों की क्रय शक्ति को बढ़ाने में भूमिका निभाई और गरीबी रेखा से उन्हें ऊपर उठाया। साथ ही बेरोजगारी को कम करने तथा पलायन को भी रोकने का कार्य किया गया।
नायक ने कहा कि केंद्र की मोदी की बीजेपी की सरकार में आर्थिक नीतियां पूरी तरह असफल रही है। कुछ क्षेत्रों में उल्लेखनीय प्रगति हुई है जैसे डिजिटल भुगतान, इंफ्रास्ट्रक्चर और स्टार्टअप इकोसिस्टम। लेकिन कई निर्णय जैसे नोटबंदी और कृषि कानून, गंभीर विवाद और आर्थिक बहस का कारण बने। कहा कि भारत जैसे विशाल देश में आर्थिक नीतियों का प्रभाव भी जटिल है। इसलिए जरूरी है कि इन नीतियों का निरंतर मूल्यांकन किया जाए। लोकतंत्र में सरकार की नीतियों पर सवाल उठाना और उनका विश्लेषण करना ही नागरिक जागरूकता का संकेत है।
नायक के अनुसार क्या वर्ष 2014 में सत्ता परिवर्तन के बाद प्रधानमंत्री बने नरेंद्र मोदी को भारत कर्ज के जाल में फंस रहा था? कहा कि आज दुनिया में कई देशों ने कर्ज के कारण गंभीर आर्थिक संकट झेले हैं, उनसे भी हमे सबक लेने की आज के परिपेक्ष्य में अति आवश्यक है। आज उदाहरण है कि ग्रीस, अर्जेंटीना, श्रीलंका जैसे देशों में अत्यधिक कर्ज लेने के कारण उनकी आर्थिक व्यवस्था को हिला दिया।
कहा कि इस दौरान मोदी सरकार ने कई बड़े आर्थिक कदम उठाए जिसमें इंफ्रास्ट्रक्चर निर्माण, डिजिटल इंडिया, मेक इन इंडिया, बड़े रक्षा सौदे किये जो अधिकतर विवादित रहे और कुछ नारों तक ही सिमित हो गये। इन सबके बीच सरकारी कर्ज भी लगातार तेजी से बढ़ता गया। आंकड़े बताते है कि वर्ष 2014 में कुल कर्ज लगभग 55 लाख करोड़ रुपये थे। मोदी की भाजपा की सरकार आने के बाद वर्ष 2020 के आसपास लगभग 105 लाख करोड़ रुपये और हाल के वर्षो में कर्ज 150 लाख करोड़ रुपये से अधिक हो चुके है। यानी एक दशक में कर्ज लगभग तीन गुना हो गया है।
नायक के अनुसार सरकारी कर्ज का अर्थ है वह पैसा जो सरकार विभिन्न स्रोतों से उधार लेती है, ताकि अपने खर्च पूरे कर सके। सरकार यह पैसा कई स्रोतों से लेती है, जिसमें सरकारी बॉन्ड, बैंक और वित्तीय संस्थान, पेंशन और बीमा फंड, अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थान से कर्ज लेना अपने आप में गलत नहीं होता है। दुनिया की लगभग तमाम सरकार विकास परियोजनाओं के लिए कर्ज लेती है। लेकिन खतरा तब पैदा होता है जब कर्ज बहुत तेजी से बढ़े, आय उससे धीमी गति से बढ़े। कर्ज का पैसा उत्पादक निवेश में न लगे, गैर योजना मद में खर्च में भारी वृद्धि, योजना मद में भारी कटौती शामिल है।
नायक के अनुसार वर्ष 2004 से 2014 तक मनमोहन सिंह का कार्यकाल भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण था।
उन्हें दुनिया के सबसे सम्मानित अर्थशास्त्रियों में गिना जाता है। उस समय भारत की सकल घरेलू विकास भी तेजी से बढ़ रही थी। इस दौरान कई वर्षों तक भारत की विकास दर 7 से 8 प्रतिशत रही। वर्ष 2014 के बाद मोदी सरकार के आने के बाद से कर्ज में तेजी से उछाल हुआ। नई सरकार ने कई बड़े आर्थिक कदम उठाए। एक दशक में कर्ज लगभग तीन गुना हो गया। हाल के वर्षों में यह बढ़कर लगभग 80 प्रतिशत के आसपास पहुंच गया है। इसका अर्थ है कि देश की अर्थव्यवस्था की तुलना में कर्ज तेजी से बढ़ रहा है। आज प्रति व्यक्ति कर्ज एक लाख रुपये से अधिक हो चुका है। इसका मतलब है कि देश का हर नागरिक चाहे गरीब हो या अमीर सरकारी कर्ज का हिस्सा ढो रहा है।
नायक के अनुसार वर्तमान में भारत सरकार के बजट में एक बड़ा हिस्सा केवल कर्ज का ब्याज चुकाने में खर्च होता है। हर साल लाखों करोड़ रुपये केवल पुराने कर्ज का ब्याज चुकाने में चले जाते हैं। इसका परिणाम यह होता है कि शिक्षा के लिए कम पैसा बचता है। स्वास्थ्य के लिए सीमित बजट रहता है। रोजगार योजनाओं पर दबाव पड़ता है। कहा कि जब सरकार की आय का बड़ा हिस्सा ब्याज चुकाने में लगने लगे, तो आर्थिक संतुलन बिगड़ सकता है।
उन्होंने कहा कि वर्तमान मोदी सरकार का कहना है कि यह कर्ज विकास परियोजनाओं में लगाया जा रहा है। जिसमें राष्ट्रीय राजमार्ग, रेलवे विस्तार, डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर, रक्षा आधुनिकीकरण शामिल है। कहा कि सरकार का तर्क है कि यह निवेश भविष्य में आर्थिक वृद्धि को बढ़ाएगा जो मुंगेरी लाल के हसीन सपनो की तरह है या अच्छे दिन आएंगे के नारो की तरह है।
नायक ने कहा कि आलोचकों का आरोप है कि कई बार कर्ज का इस्तेमाल चुनावी राजनीति के लिए किया जाता है। उदाहरण स्वरूप मुफ्त योजनाएं अल्पकालिक घोषणाएं, लोकप्रिय लेकिन आर्थिक रूप से महंगी योजनाएं, अगर कर्ज से स्थायी उत्पादन नहीं बढ़ता, तो वह भविष्य के लिए बोझ बन सकता है। जिससे देश आर्थिक गुलामी की और बढ़ सकता है।
नायक ने कहा कि भारत दुनिया की सबसे युवा आबादी वाला देश है। मोदी सरकार ने सत्ता में आने से पूर्व कहा था की प्रति वर्ष 2 करोड़ युवाओ को रोजगार दिया जायेगा, मगर यह भी सपना ही बन कर रह गया। आज भी देश में बेरोजगारी एक बड़ी और विकराल समस्या बन गई है। लाखों युवा सरकारी नौकरियों के लिए संघर्ष कर रहे हैं। छोटे उद्योग बंद हो रहे हैं। कर्ज का बोझ मोदी सरकार में बढ़ता जा रहा है लेकिन रोजगार नहीं बढ़ पा रहा है, जो मोदी सरकार की आर्थिक नीतियों पर बड़ा सवाल खड़ा कर रहा है।
उन्होंने कहा कि दुनिया के कई देश कर्ज के कारण आर्थिक संकट में फंस चुके हैं। आज उन देशों में कर्ज इतना बढ़ गया कि सरकारों को कठोर आर्थिक कदम उठाने पड़े। हालाँकि भारत अभी उस स्थिति में नहीं है, लेकिन विशेषज्ञ चेतावनी देते हैं कि कर्ज की गति पर नियंत्रण जरूरी है नही तो स्थिति विषम होगी और आर्थिक गुलामी की ओर शनै: शनै: भारत के कदम उस और बढ़ सकते है।
उन्होंने कहा कि आर्थिक इतिहास बताता है कि कई देशों ने अत्यधिक कर्ज के कारण अपनी आर्थिक स्वतंत्रता खो दी। जब देश का बड़ा हिस्सा कर्ज चुकाने में लगने लगे, तो सरकार की नीतियां भी कर्ज देने वालों के दबाव में आ सकती हैं। इसीलिए अर्थशास्त्री कहते हैं कि कर्ज पर नियंत्रण आर्थिक स्वतंत्रता के लिए जरूरी है। कहा कि लोकतंत्र में सरकार जनता के प्रति जवाबदेह होती है। इसलिए देश के नागरिक को सवाल पुछने का अधिकार है कि कर्ज क्यों बढ़ रहा है? कर्ज का पैसा कहाँ खर्च हो रहा है? क्या इससे रोजगार पैदा हो रहा है? जब जनता जागरूक होगी, तभी आर्थिक नीतियों पर जवाबदेही तय होगी।
उन्होंने कहा कि देश के पास अभी भी मजबूत संभावनाएं हैं। अगर सही नीतियां अपनाई जाएं तो देश आर्थिक रूप से और मजबूत बन सकता है। इसके लिए जरूरी है विनिर्माण क्षेत्र का विस्तार किया जाय, रोजगार सृजन की दिशा में एतिहासिक ठोस पहल किया जाय, राजकोषीय अनुशासन को सख्ती से लागु किया जाय, आर्थिक प्रबंधन को मजबूती के साथ लागु किया जाय, गैर योजना स्थापना मद में कटौती किया जाय, योजना मद की राशी को बढाया जाय, शिक्षा और स्वास्थ्य, कृषि, अनुसन्धान व् रोजगार बढाने वाले क्षेत्रो में निवेश बढाया जाय।
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