एस. पी. सक्सेना/बोकारो। बोकारो जिला के हद में गोमिया प्रखंड के होसिर पश्चिमी पंचायत के देवीपुर में सलाना आयोजित होनेवाले मंदिर में पूजा आसपास के रहिवासियों में खास महत्व रखता है। यहां मकर संक्रांति पर आयोजित होनेवाले एक दिवसीय भव्य मेला की बात हीं निराली है। यहां लगनेवाले मेला में खासकर लोहा, स्टील तथा लकड़ी से बने सामग्री की बहुतायत देखने को मिल रहा है। इसके अलावा यहां कई मिष्ठान दुकान, चाट, चाउमीन तथा गोलगप्पे की दुकाने तथा खिलौनो व् छोटे-बड़े कपड़ो की दुकान मेला की भव्यता को दर्शाता है।
देवीपुर स्थित खेला चंडी का ऐतिहासिक महत्व और लगनेवाले मेला के बावत मेला के समीप रहनेवाले रहिवासी झारखंड आंदोलनकारी वयोवृद्ध लव नाथ देव के अनुसार यहां वर्ष 1765 ईस्वी से लगातार पूजा की जा रही है। साथ हीं यहां मकर संक्रांति के अवसर पर प्रारंभ काल से हीं मेला का आयोजन किया जाता रहा है।
लव नाथ देव ने 14 जनवरी की संध्या एक भेंट में बताया कि एक पौराणिक कथा के अनुसार जब उनके पूर्वज यहां आये थे, तब यहां घना जंगल था। तब यहां बाघ-शेर आदि जंगली जानवर विचरण करते थे। तब कोई नहीं जानता था कि इस स्थल का दैवीय महत्व भी है। उन्होंने बताया कि इस दौरान वर्ष 1765 में उनके पूर्वज जब यहां आकर बसे, इस दौरान उन्हें स्वप्न आया कि देवी माता ने दर्शन देकर इस स्थल के महत्व को बताया। स्वप्न में मिले निर्देश पर हीं उनके पूर्वजों ने इस स्थल का नामाकरण खेला चंडी किया था। इसके बाद यहां के एक वट वृक्ष तले उनके पूर्वजों द्वारा प्रतिमा स्थापित कर माता खेला चंडी की विधि विधान से पुजा की जाने लगी।
उन्होंने बताया कि उनके पूर्वजों के अनुसार खुली आंखो यहां रजरप्पा की माता छिन्नमास्तिका, वनासो माता, साड़म की माता बगलतवा देवी आदि माता के सातों स्वरूप बालिका रूप में वट वृक्ष के निचे अर्ध रात्रि में जब नृत्य करते देखा था, इसके बाद से उनकी आस्था माता खेला चंडी के प्रति और बढ़ गया। तब से नाथ देव परिवार द्वारा इन्हे अपना कुल देवी मानने लगा। कालांतर में वर्ष 1950 में उक्त वट वृक्ष के निचे एक छोटा मंदिर बनाकर प्रतिमा को पुनःस्थापित किया गया, जो आज भव्य मंदिर के रूप में देखा जा रहा है।

लव नाथ देव ने बताया कि सन् 1765 का उक्त वट वृक्ष वर्ष 2008 में आयी तेज आंधी के कारण धराशायी हो गया। इसके बाद तब के झारखंड सरकार के मंत्री रहे स्थानीय विधायक माधव लाल सिंह तथा मंत्री राजेंद्र प्रसाद सिंह द्वारा माता खेला चंडी स्थान पर संयुक्त रूप से मंदिर निर्माण का शिलान्यास किया गया था। जिससे इस मंदिर का निर्माण संभव हो सका।
उन्होंने बताया कि वर्ष 2008 में वट वृक्ष गिरने से स्थापित माता खेला चंडी की प्रतिमा आंशिक रूप से क्षतिग्रस्त हो गया था। उनका प्रयास है कि उक्त प्रतिमा को जन सहयोग से सीधा किया जाये। उन्होंने बताया कि उनके पूर्वजों द्वारा दान में दी गयी भूमि पर हीं प्रतिवर्ष मकर संक्रांति के अवसर पर खेला चंडी मेला का आयोजन किया जा रहा है।
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