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रंग-उल्लास के दूसरे दिन वैष्णव व् मरणोपरान्त नाटक का मंचन

एस. पी. सक्सेना/पटना (बिहार)। बिहार की राजधानी पटना में आयोजित दोदिवसीय रंग – उल्लास नाट्योत्सव के दूसरे दिन 7 दिसंबर को दो नाटक वैष्णव तथा मरणोपरान्त का मंचन किया गया।

जानकारी देते हुए कलाकार साझा संघ सचिव सह रंग – उल्लास के मीडिया प्रभारी मनीष महीवाल ने बताया कि द्वितीय दिवस सन्ध्या 7 बजे से रंगरूप वैशाली की नाट्य प्रस्तुति वैष्णव का मंचन प्रयास रंग अड्डा पटना में किया गया। उन्होंने बताया कि प्रसिद्ध व्यंग्यात्मक कथाकार हरि शंकर परसाई लिखित कहानी वैष्णव जिसका नाट्य रूपांतरण राजेश कुमार द्वारा किया गया है एवं निर्देशन रंगकर्मी अंजारूल हक़ ने किया है।

महीवाल ने बताया कि नाटक का कथासार वैष्णव की फिसलन एक महत्पूर्ण व्यंग्य रचना है। जिसके माध्यम से सेठ, साहूकारों, महाजनों, व्यापारियों, धनलोभियों पर प्रतीकात्मक गहरी करारी चोट की गयी है। व्यापार धर्म की ओट लेकर आगे बढ़ता है तो पतन दिखने लगता है। वैष्णव भी उन्ही में से एक है। बताया गया कि तर्क के आगे पाप-पुण्य में भेद समाप्त हो जाता है। क्या पैसा ही सब कुछ है? ईश्वर ने जग में मानव की रचना क्या इसीलिए की है? हमारा सामाजिक दायित्व क्या यही है?

सशक्त निर्देशन एवं उम्दा अभिनय इस नाट्य प्रस्तुति की ख़ासियत है। कुल मिलाकर उक्त नाटक को एक सराहनीय प्रस्तुति कही जाएगी। वैष्णव नाटक में भाग लेने वाले कलाकारों में मंच पर आदिल रशीद, मंच से परे (नेपथ्य कर्मी) निर्देशक अंजारूल हक़, नाट्य रूपांतरण राजेश कुमार, प्रकाश रवि बबलू, मेकअप प्रिंस राज, मीडिया प्रभारी मनीष महिवाल है। महोत्सव के द्वितीय दिवस की सन्ध्या द्वितीय प्रस्तुति नाटक मरणोपरान्त का सफल मंचन शुभ्रो भट्टाचार्या के निर्देशन में रात्रि 8:15 से किया गया।

महीवाल ने बताया कि नाटक मरणोपरान्त का कथासार के अनुसार महानगरों की जीवन शैली में आर्थिक सम्पन्नता एक मजबूरी बन जाती है। बेहतर जीवन जीने की लालसा में इंसान दिन-रात केवल धन संग्रह के लिए प्रयासरत रहते हैं। इस होड़ में कई बार इंसान एक ही छत के नीचे रहते हुए भी एक – दूसरे के साथ नहीं होते हैं। यह नाटक एक ऐैसी ही पति-पत्नी की कहानी है जिसके जीवन में एक तीसरे व्यक्ति का भी प्रवेश हो जाता है, यानी पत्नी के प्रेमी का। इसका खुलासा तब होता है जब पत्नी की एक दुर्घटना में आकस्मिक मृत्यु हो जाती है।

नाटक के अनुसार पत्नी की मृत्यु के उपरांत उसका पति एवं प्रेमी एक – दूसरे से मिलते हैं एवं अपनी-अपनी यादें साझा करते हैं। अफसोस की बात है कि अब उनके पास पश्चाताप के अलावा कुछ भी नहीं रह जाता है। मुलाकात के उपरान्त दोनों अपने अपने जीवन में व्यस्त हो जाते हैं और सामान्य जीवन जीने लगते हैं। उक्त नाटक के मंच पर पहला व्यक्ति (पति) सौरभ राजा तथा दूसरा व्यक्ति (प्रेमी) का अभिनय धीरज कुमार ने निभाया है, जबकि मंच से परे (नैपथ्य में) मंच सज्जा राजीव रंजन केसरी, मेकअप प्रिंस राज, वस्त्र विन्यास धीरज कुमार, प्रकाश परिकल्पना रवि बबलू, परिकल्पना एवं निर्देशन शुभ्रो भट्टाचार्या ने किया है।

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