
प्रहरी संवाददाता/बड़बिल (ओडिशा)। ओडिशा राज्य के बालासोर जिला के फकीर मोहन स्वायत्त महाविद्यालय की द्वितीय वर्ष इंटीग्रेटेड बीएड की 20 वर्षिया छात्रा सौम्यश्री विशी ने भुवनेश्वर के एम्स में 55 घंटे तक जीवन के लिए संघर्ष करने के बाद आख़िरकार मौत के आगोश में सो गयी। लचर व्यवस्था के आगे बेबस बेटी को क्या मौत के बाद भी न्याय मिल सकेगा और दोषी प्रोफेसर के खिलाफ कार्रवाई संभव हो पायेगा। यह सवाल ओडिशा राज्य के चप्पे-चप्पे में कौध रहा है।
बताया जाता है कि सौम्यश्री लंबे समय से प्रोफेसर के मानसिक उत्पीड़न की शिकार थी। पीड़िता ने प्रोफेसर के बारे में कॉलेज अध्यक्ष को यौन शोषण, यातना और परीक्षा में फेल करने की धमकी की जानकारी दी थी। लेकिन कोई कार्रवाई न होने पर वह स्थानीय पुलिस के पास फरियाद लेकर गई। फिर भी कोई कार्रवाई नहीं हुई।
पीड़िता ने इस मामले को लेकर कॉलेज अध्यक्ष से लेकर उच्च शिक्षा मंत्री, स्थानीय सांसद, मुख्यमंत्री और केंद्रीय मंत्री तक से शिकायत की। किसी ने उसकी गुहार नहीं सुनी। यहां तक कि किसी ने भी उसे महत्व नहीं दिया। उल्टे कॉलेज प्रशासन उसे गलत साबित करने में लग गया।
आख़िरकार वर्तमान व्यवस्था से बगावत करते हुए बीएड की छात्रा सौम्यश्री ने थक हार कर खुद को आग के हवाले कर दिया। मानसिक प्रताड़ना चलते उसने बीते 12 जुलाई को खुद को आग लगाकर आत्महत्या करने की कोशिश की। उसके सहपाठियों ने उसे गंभीर हालत में बचाने के प्रयास में उसे लेकर बालासोर जिला अस्पताल भर्ती करायी। स्थिति की गंभीरता को देखते हुए सौम्यश्री को बालासोर जिला अस्पताल से एम्स भुवनेश्वर रेफर किया गया था। जहां इलाज करा रही सौम्यश्री का बीते 14 जुलाई की रात 11:46 बजे निधन हो गया।
बताया जाता है कि छात्रा की मृत्यु के बाद प्रशासनिक दबाब व् अनहोनी की आशंका को लेकर कड़ी सुरक्षा के बीच देर रात शव का अंतिम संस्कार कर दिया गया। इस घटना में पूर्व में निलंबित आरोपी प्रोफेसर समीर साहू को गिरफ्तार कर लिया गया था, जबकि निलंबित अध्यक्ष दिलीप कुमार घोष को पुलिस ने बीते 14 जुलाई को गिरफ्तार कर अदालत में पेश किया। जहां जिला अपर सुरक्षा अध्यक्ष, उप सुरक्षा अध्यक्ष सहदेव खुंटा, थाना प्रभारी के साथ व अन्य पुलिस अधिकारियों की एक टीम चेयरमैन के क्वार्टर पर पहुंची और उन्हें गिरफ्तार कर लिया।
प्रशासन कुम्भ करण की नींद से कब जागेगा? कब त्वरित कार्रवाई कर ऐसी घटनाओं को कब रोकेंगे? ऐसे मामले सामने आने के बाद क्यों हर बार पुलिस प्रशासन स्वयं को असहाय महसूस करती है? क्यों पुलिस प्रशासन जनता के प्रति अपनी जिम्मेदारी नहीं समझती? कौन तथाकथित है जो कार्यवाही करने से रोक रही हैं? इन सब बातों का जवाब शायद कभी नहीं मिलेगा।
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