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मोनिका प्रकरण से आंदोलन पर उठ रहे सवालों पर माले नेता ने की अपील

बेटियों की कंकाल का इंतजार नहीं, अताताईयों से बेटियों को बचाने को लड़ते रहेंगे-सुरेंद्र

एस. पी. सक्सेना/समस्तीपुर (बिहार)। दलित-गरीब, पीड़ितों, वंचितों, अक्लियतों को आंदोलन के माध्यम से न्याय दिलाने को भाकपा माले नेता सुरेंद्र प्रसाद सिंह पिछले 35 वर्षों से आंदोलनरत रहे है। समस्तीपुर की बेटी मोनिका के गायब प्रकरण से आंदोलन पर उठ रहे सवालों पर माले नेता ने आमजनों से अपील की है।

माले नेता सिंह कहते है कि वे आंदोलन को अच्छी तरह समझते है। इसमें न सिर्फ आइसा, इनौस, ऐपवा, माले बल्कि हमारे विचारधारा के विरोधी सामाजिक एवं राजनीतिक संगठनों भी हमारे आंदोलनों का हिस्सा रहे हैं और हमने आंदोलन के बल पर हजारों-हजार पीड़ितों को दबंगों, अपराधियों के अलावे पुलिस, प्रशासन, जनप्रतिनिधि, सत्ता, सरकार से लड़कर न्याय दिलाया है। कहते है कि वे दर्जनभर सर्वदलीय संगठन भी चलाते हैं, जिनसे हजारों आंदोलनकारी जुड़े हैं।

सवाल है कि आंदोलन जरूरी क्यों है? क्या आंदोलन से न्याय दिलाया जा सकता है? तो जबाब सुन लीजिए… कई बार ऐसा देखा गया है कि पिड़ित दलित, गरीब, निरक्षर, कमजोर वर्ग के हैं। पुलिस- प्रशासन पर आरोपी, दबंगों का दबाव है। पुलिस पर आरोपी को बचाने का राजनीतिक दबाव है।

पुलिस कभी जान बूझकर तो कभी अनजाने में तथ्य से सत्य की ओर नहीं पहुंच पाती है। कई बार जांच अधिकारी से भी भूल हो जाता है। पीड़ित आवाज नहीं उठा पाता है। वहां नहीं पहुंच पाता है, जहां उसे पहुंचना चाहिए। वैसी स्थिति में पुलिस- प्रशासन, जनप्रतिनिधि, सत्ता, सरकार, न्याय संस्थानों का ध्यानाकर्षण के लिए आंदोलन किया जाता है और आंदोलन की दिशा सही हो तो जीत मिलती है। न्याय मिलता है।

रही बात समस्तीपुर जिला के हद में कर्पूरीग्राम की बेटी मोनिका प्रकरण का। इसमें कुछ तथाकथित आंदोलन को कटघरे में खड़ा कर रहे हैं। आंदोलनकारियों का मनोबल तोड़ रहे हैं। आंदोलनकारियों को खूब सोच- समझकर आंदोलन करने की हिदायत दे रहे हैं। उनका मानना है कि कुछेक मामलों मसलन अपहरण, रेप, उत्पीड़न में जब आप सोचने- समझने में बहुत ज्यादा समय लगाएंगे तो बेटियों का कंकाल ही मिलेगा। उनकी जनाजे को कंधा देने के लिए तैयार रहना होगा।

सीधा लापता मोनिका पर बात की जाये तो उसके पिता ने ही दरभंगा नगर थाना में बीते माह 28 जून को 121/2025 मुकदमा दर्ज कराये। वे आगे आकर अपनी पुत्री के गायब होने और बरामद करने में पुलिस की विफलता का प्रेस बयान भी दिया। पीड़ित परिजन से मिलने के बाद 6 दिन आंदोलन शुरू हुआ। आपको याद दिला दें कि कई बार 5-6 दिन चुप रहने पर हमें पीड़ितों का जनाजा ही ढ़ोना पड़ा है। मोनिका बालिग है। जीवन साथ चुनने का संविधान प्रदत्त उसका अधिकार है।

अगर उसने शादी कर ली और परिजन से डर है, वह पीजी की छात्रा है। उसे अपने माता-पिता या अन्य परिजनों को जानकारी दे देना चाहिए या फिर पति के साथ सोशल मीडिया पर आकर अपनी बात रखनी चाहिए, लेकिन उसने 6-7 दिन चुप रहकर रहिवासियों को मुगालते में रखा। परिणाम हुआ अनहोनी से चिंतित उसके पिता को एफआईआर दर्ज कराना पड़ा। पुलिस निष्क्रियता का बयान देना पड़ा।

आंदोलनकारियों की आलोचना होने लगी और फिर आंदोलन का दौर शुरू हुआ। हमारा मत है कि अगर आंदोलन नहीं होता, मामला चर्चित नहीं होता, पुलिस, सत्ता-सरकार की आलोचना नहीं होती तो मोनिका सोशल मीडिया के समक्ष उपस्थित नहीं होती और पूरा प्रकरण समझ से पड़े रहता। इस मामले में आंदोलनकारियों ने अपना सामाजिक कर्तव्य निभाया और हम भविष्य में भी ऐसे मामले में हाथ पर हाथ धरे नहीं बैठेंगे।

जिस तरह से बेटियों-महिलाओं पर अत्याचार, दुष्कर्म, हत्या, अपराध, ह्यूमन ट्रेफिकिंग के मामले बढ़े हैं। पुलिस- अपराधी- राजनेता का गठजोड़ मामले को दबाना, भटकाना चाहती है, वैसी स्थिति में न्याय दिलाने को त्वरित आंदोलन की जरूरत महसूस की जाती रही है। नि:संदेह हमें हर कीमत पर हर कुर्बानी देकर आंदोलन के वास्ते तैयार रहना चाहिए, अन्यथा लाशों का बोझ उठाने की भी सीमा पार हो जाएगा। गुंगी- बहरी सत्ता-सरकार- पुलिस- अधिकारी को चीर निद्रा से जगाने के लिए आंदोलन की जरूरत हमेशा महसूस किया जाएगा।

कहा कि अभी मोनिका प्रकरण खत्म भी नहीं हुआ है, हमारे सामने ताजपुर, उजियारपुर आदि जगहों की बेटियां न्याय दिलाने को आंदोलनकारियों को पुकार रही हैं। क्या आंदोलनकारी अपनी आंखें बंद कर लेंगे? आंदोलनकारियों को डेमरलाईज नहीं, बल्कि हौसला अफजाई कीजिए।

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