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संत जेवियर्स विद्यालय में दो दिवसीय संगोष्ठी का आयोजन

रंजन वर्मा/कसमार (बोकारो)। बीते लगभग छः दशकों से शिक्षा के क्षेत्र में अपना अद्भुत योगदान देने वाले बोकारो इस्पात नगर के जाने-माने एवं प्रतिष्ठित संत जेवियर्स विद्यालय में शिक्षक एवं शिक्षिकाओं की कौशल अभिवृद्धि और शिक्षण पद्धति संबंधित नवीनतम जानकारी हेतु दो दिवसीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया।

संगोष्ठी का शुभारंभ कार्यक्रम के प्रमुख वक्ता और शिक्षाविद फादर सनी जेकब एसजे को कर्मचारी प्रतिनिधि इंदु आर्या और आशुतोष द्वारा स्मृति चिन्ह स्वरूप पौधा और शॉल भेंट कर किया गया। इस अवसर पर विद्यालय के प्रधानाचार्य फ़ादर अरुण मिंज एसजे ने विशेषज्ञ वक्ता का परिचय कराते हुए शिक्षा के क्षेत्र में उनके योगदान और उपलब्धियों पर प्रकाश डाला और कार्यक्रम के क्रियान्वयन को आगे बढ़ाया।

फादर सनी जेकब ने शिक्षा के क्षेत्र में वर्तमान परिप्रेक्ष्य में शिक्षकों की बदलती भूमिका पर प्रकाश डालते हुए संगोष्ठी की प्रभावशाली शुरुआत की। विशेषज्ञ वक्ता ने स्पष्ट किया कि अब शिक्षकों की भूमिका पारंपरिक ज्ञान देने वाले से बदलकर मार्गदर्शक, प्रेरक और सहायक की हो गई है। आज का शिक्षक एक फैसिलीटेटर (सहायक), मेंटॉर (मार्गदर्शक) और लीडर (नेतृत्वकर्ता) की भूमिका निभा रहा है, जो विद्यार्थियों के व्यक्तित्व के सर्वांगीण विकास में सहायक है।

आज के परिप्रेक्ष्य में डिजिटल शिक्षा, स्मार्ट क्लास, ऑनलाइन शिक्षा और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (कृत्रिम बुद्धिमत्ता) जैसे क्षेत्रों में भी शिक्षकों को अद्यतन रहना आवश्यक हो गया है। इसलिए कहा जा सकता है कि आज के बदलते परिवेश में शिक्षकों की भूमिका और भी व्यापक, सक्रिय और उत्तरदायी हो गई है।

नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति पर प्रकाश डालते हुए स्पष्ट किया गया कि पुराने शिक्षा ढाँचे में कई सीमाएँ थी जैसे रटने पर ज़ोर, व्यावहारिक ज्ञान की कमी और बहुपक्षीय विकास की उपेक्षा। जबकि 21वीं सदी की चुनौतियों के अनुरूप शिक्षा का उद्देश्य केवल डिग्री प्रदान करना नहीं, बल्कि सोचने, समझने और जीवन – कौशल विकसित करने वाली शिक्षा देना है। आज के वैश्विक और तकनीकी युग में गुणवत्तापूर्ण और समावेशी शिक्षा सुनिश्चित करने के लिए एनईपी की आवश्यकता नितांत अनिवार्य और समयानुकूल है।

संगोष्ठी में दक्षिण अफ्रीका के नेता और मानवाधिकारों के प्रतीक नेल्सन मंडेला के कथन को स्पष्ट करते हुए बताया गया कि शिक्षा सबसे शक्तिशाली हथियार है जिसका उपयोग हम दुनिया को बदलने के लिए कर सकते हैं। मंडेला द्वारा कहा गया था कि यदि आप किसी देश को बर्बाद करना चाहते हैं तो उसकी शिक्षा व्यवस्था को नष्ट कर दीजिए।

शिक्षा में सतहीपन के संदर्भ में मंतव्य रखते हुए उन्होंने यह स्पष्ट किया कि आज डिग्रीधारियों की नहीं बल्कि आवश्यकता है गुणवत्ता, अनुभव जन्य ज्ञान और नैतिक मूल्यों की ओर ले जाने वाली शिक्षा की, जहाँ गहराई, समझ और सोच को प्राथमिकता मिले, न कि केवल ऊपरी उपलब्धियों को। कहा कि प्रत्येक विद्यार्थी अद्वितीय है। उनमें अंतर्निहित क्षमताओं की पहचान कर उन्हें विकसित करने की आवश्यकता है। उनकी रचनात्मकता, आलोचनात्मक सोच, संवाद कौशल, नेतृत्व क्षमता और भावनात्मक बुद्धिमत्ता को पहचानने और प्रोत्साहित करने की जरूरत है।

संगोष्ठी में स्पष्ट किया गया कि 21वीं शताब्दी की शिक्षा प्रणाली अब केवल परीक्षा पास करने तक सीमित नहीं रही। आज का युग कौशल पर आधारित है। शिक्षा में हार्ड स्किल्स और सॉफ्ट स्किल्स का विशेष महत्त्व है। हार्ड स्किल्स छात्रों की बौद्धिक शक्ति और क्षमता है और सॉफ्ट स्किल्स उनकी व्यावहारिक योग्यता। दोनों के संतुलित विकास से ही शिक्षा पूर्ण मानी जाती है और एक सक्षम, सफल और संवेदनशील समाज का निर्माण संभव होता है।

संगोष्ठी में बाल शोषण के संदर्भ में बच्चों की देखभाल और सुरक्षा के विषय में भी चर्चा हुई। कहा गया कि बच्चे किसी भी देश का भविष्य होते हैं। उनका शारीरिक, मानसिक, सामाजिक और भावनात्मक विकास एक सुरक्षित और संरक्षित वातावरण में ही संभव है। दुर्भाग्यवश, आज के समाज में बाल शोषण एक गंभीर समस्या बन चुका है। यह शारीरिक, मानसिक, यौनिक या भावनात्मक किसी भी रुप में हो सकता है। ऐसे में बच्चों की देखभाल और उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करना समाज, सरकार, अभिभावक और शिक्षकों की सामूहिक जिम्मेदारी है।

शिक्षक – शिक्षिकाओं के समग्र विकास, सामूहिक समन्वय एवं सहयोग की भावना को प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से संगोष्ठी के अंतर्गत समूह गतिविधियों का आयोजन भी प्रशंसनीय रहा। विद्यालय के प्रधानाचार्य ने दो दिवसीय संगोष्ठी के समापन के अवसर पर विशिष्ट वक्ता और शिक्षाविद फ़ादर सनी जेकब की भूरि- भूरि प्रशंसा की और उन्हें भेंट अर्पित किया।

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