Advertisement

संस्कृति की रक्षा व सनातन धर्म के प्रचार-प्रसार के लिए अलख जगा रहा उदासीन पंथ

हरिद्वार से महंतों के नेतृत्व में 52 संतों का काफिला पहुंचा सोनपुर, महंत ने किया स्वागत

अवध किशोर शर्मा/सारण (बिहार)। सनातन धर्म के प्रचार -प्रसार एवं भारतीय संस्कृति की रक्षा के संकल्प के साथ हरिद्वार से उदासीन पंथ के संतों का एक बड़ा जत्था बीते दिनों सारण जिला के हद में सोनपुर स्थित लोकसेवा आश्रम पहुंचा। जत्थे का नेतृत्व हरिद्वार के मुखिया महंत दुर्गा दास एवं मुखिया महंत राम मोनी दास महाराज कर रहे थे।

सोनपुर स्थित उदासीन संप्रदाय के लोकसेवा आश्रम में महंत संत विष्णुदास उदासीन उर्फ मौनी बाबा ने आश्रम पहुंचे संतों का भव्य स्वागत किया। इस जत्था में 52 संत शामिल हैं।
इस संबंध में हरिद्वार के कनखल स्थित बड़ा अखाड़ा के महंत दुर्गा दासजी महाराज बताते हैं कि बीते 500 वर्षों से उदासीन संप्रदाय निरंतर सनातन धर्म एवं भारतीय संस्कृति की रक्षा के संकल्प के साथ आदर्शों का भी प्रचार – प्रसार करता रहा है। कहा कि उदासीन पंथ सम्प्रदाय के साथ ही उदासीन संस्था की नैतिक भावनाओं का प्रचार – प्रसार कर रहा है।

उन्होंने कहा कि उदासीन संप्रदाय के संत ही अनादि काल से शिरोमणि रहे हैं। राजा -रजवाड़ों से लेकर वर्तमान व्यवस्था तक उदासीन संतों द्वारा सभ्यता, संस्कृति के साथ-साथ धर्म की रक्षा करने का काम किया जाता रहा है। उन्होंने बताया कि 52 संतों का यह काफिला निरंतर प्रवास कर रहा है। इसी प्रवास के क्रम में सोनपुर आगमन हुआ है। यह जत्था प्रयागराज श्रीपंचायती उदासीन बड़ा अखाड़ा से बीते 10 अप्रैल को अपनी यात्रा का शुभारंभ किया था।

इस दौरान देश के 10 उदासीन अखाड़ों/आश्रमों पर प्रवास अबतक संभव हो पाया है। प्रवास के क्रम में उत्तर प्रदेश के प्रयागराज से भदोई जिले के गोपीगंज वहां से काशी विश्वनाथ बनारस, आजमगढ़, कप्तानगंज, देवगांव, गाजीपुर, बलिया, बिहार प्रदेश के सारण जिला के हद में जलालपुर, मशरख, मढ़ौरा, रहीमपुर और अब सोनपुर लोकसेवा आश्रम पहुंचा है।

गुरुनानक पुत्र श्रीचन्दजी महाराज हैं उदासीन पंथ केप्रवर्तक

बताया जाता है कि वर्ष 1494 से 1643 के दौरान गुरु नानक देव के पुत्र श्रीचन्दजी महाराज ने उदासीन सम्प्रदाय की स्थापना की थी। सनातन धर्म तथा पञ्च-प्रकृति (जल, अग्नि, पृथ्वी, वायु, आकाश) की पूजा करते हैं। इस सम्प्रदाय के साधु सांसारिक बातों की ओर से विशेष रूप से तटस्थ रहते हैं।

सिखों के पूज्य आदि गुरु ग्रंथ के प्रति सम्मान रखते हैं और घंटा -घड़ियाल बजाकर उसकी आरती भी करते हैं।हिंदुओं के व्रतों एवं त्योहारों को भी सम्मान देते हैं। पर विशिष्ट उत्सव श्रीचंद्रजी महाराज की जयंती के रूप में मनाया जाता है। सनातन धर्म का प्रचार, प्रसार, संरक्षण, संवर्द्धन और उत्थान इस अखाड़े का मुख्य उद्देश्य रहा है।

Loading

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *