संतों ने कहा है मन शिक्षा से नहीं दीक्षा से होता है नियंत्रित-देवी प्रिया भगवती
अवध किशोर शर्मा/सारण (बिहार)। सारण जिला के हद में सोनपुर प्रखंड के गंगा गंडक संगम तीर्थ के सबलपुर उत्तरी पंचायत के नेवल टोला वार्ड 7 में चल रहे सात दिवसीय श्रीमद्भागवत कथा ज्ञान यज्ञ के छठे दिन 22 मई को कथावाचिका देवी प्रिया भगवती द्वारा प्रवचन प्रस्तुत किया गया।
इस अवसर पर कथावाचिका देवी प्रिया भगवतीजी ने कहा कि संतों ने कहा है कि मन शिक्षा से नहीं बल्कि दीक्षा से नियंत्रित होता है। उन्होंने भगवान श्रीकृष्ण के महारास को सिद्ध योगियों की लीला बताते हुए कहा कि वासना और प्रेम का बाहरी रूप समान दिखाई देता है, परन्तु प्रेम में स्वयं के सुख की अपेक्षा नहीं होती। बल्कि प्रियतम को सुख पहुंचाना हीं प्रेम का मूल भाव है।
कथावाचिका ने कहा कि भगवान की महारास लीला इतना दिव्य है कि स्वयं भोलेनाथ उनके बाल रूप के दर्शन करने के लिए गोकुल पहुंच गए। उन्होंने कहा कि महारास लीला द्वारा हीं जीवात्मा का परमात्मा से मिलन संभव हो सका। उन्होंने रास पंच अध्याय का वर्णन करते हुए कहा कि महारास में पांच अध्याय हैं। उनमें गाए जाने वाले पंच गीत भागवत के पंच प्राण हैं। जो भी ठाकुरजी के इन पांच गीतों को भाव से गाता है, वह भव पार हो जाता है। बताया कि कंस वध की कथा में मथुरा गमन प्रसंग में अक्रूरजी भगवान को लेने आए।
जब भगवान श्रीकृष्ण मथुरा जाने लगे, समस्त ब्रज की गोपियां भगवान कृष्ण के रथ के आगे खड़ी हो गई और कहने लगी हे कन्हैया जब आपको हमें छोड़कर ही जाना था तो हम से प्रेम क्यों किया। कंस वध के विषय पर उन्होंने कहा कि अधर्म का नाश कर धर्म की रक्षा करने के संकल्प के साथ ही भगवान इस धरती पर अवतरित हुए थे।
अत्याचारी मामा कंस का वध कर श्रीकृष्ण ने दिया बुराई पर अच्छाई का संदेश
कथा प्रसंग में कथा वाचिका ने कहा कि भगवान श्रीकृष्ण अपने मामा कंस का वध कर बुराई पर अच्छाई का संदेश दिया। कंस मन का प्रतीक है। आज भी वह प्रत्येक मानव को बुराईयों की ओर ले जा रहा है। इसका प्रमाण है, हमारा वर्तमान समाज। आज समाज में बढ़ता पाप और भ्रष्टाचार मानव मन की देन है। प्रत्येक मानव अपने स्वार्थ की पूर्ति करना चाहता है, फिर वह मार्ग पाप का ही क्यों न हो।
उन्होंने कहा कि संतों ने इसीलिए कहा है कि मन शिक्षा से नहीं बल्कि दीक्षा से नियंत्रित होता है। मनुष्य की मन, बुद्घि और सोंच के अनुसार धर्म की अनेक परिभाषाएं है, पर ये परिभाषाएं भी मानव मन को बदलने में असमर्थ है। इसलिए आवश्यकता है श्रीकृष्ण जैसे गुरु की शरण में जाने की। वहीं इस मथुरा रुपी देह में ईश्वर का प्रगटीकरण करते है और तभी मन रुपी कंस की समाप्ति होगी। उन्होंने बताया कि कंस का एक रिश्तेदार जरासंध कंस की मृत्यु का बदला लेने के लिए बार-बार मथुरा पर आक्रमण करने लगा था।

उसने मथुरा की सेना से 10 गुणा बड़ी सेना लेकर 17 बार मथुरा पर आक्रमण किया, लेकिन हर बार श्रीकृष्ण और बलराम अपनी चालाकी से उसे हरा देते। लेकिन वह फिर सशक्त होकर हमला कर बैठता था। जब उसने 18वीं बार बड़ी सेना लेकर हमला किया, तो श्रीकृष्ण ने महसूस किया कि जरासंध का वध उनके हाथों नहीं लिखा है। बार-बार बचाव करने में मथुरा की सेना और प्रजा का काफी नुकसान हो रहा है। जरासंध उनसे व्यक्तिगत बदले की भावना से हमला कर रहा है। अगर उन्होंने इस बार हमला का जवाब दिया, तो यादवों का समूल नाश हो जाएगा।
इसलिए, मथुरा की भलाई के लिए उन्होंने अपने परिवार और मित्रों सहित एक नए प्रदेश में जाकर बसने का फैसला किया। रातों-रात मथुरा छोड़ने के कारण ही श्रीकृष्ण को रणछोड़ भी कहा गया है। व्यास पीठ से कथावाचिका द्वारा गोपी उद्धव संवाद, श्री कृष्ण एवं रुकमणी विवाह उत्सव पर मनोहर झांकी प्रस्तुत की गई। भगवान श्रीकृष्ण रुकमणीजी के विवाह प्रसंग का समस्त श्रद्धालु भक्तजनों ने आंनद लिया। यज्ञ में समाजसेवी लालबाबू पटेल एवं यजमान के रूप में जयराम राय, सबलपुर उत्तरी पंचायत के पूर्व पैक्स अध्यक्ष संगीता देवी की विशेष भूमिका रही।
इस अवसर पर समाजसेवी लालबाबू पटेल, अरविंद तिवारी, रमेश तिवारी, श्रीलाल पाठक, ओमकार नाथ सिंह, ओम तिवारी, भुनेश्वर पंडित, भुनेश्वर पहलवान, छबीला राय, बिनोद बाबा, महाराष्ट्र कामगार मोर्चा के महासचिव अजय दूबे, सुखपाल निषाद, दिल्ली के सुमित बंसल, राजस्थान से आये अजय शर्मा सहित सबलपुर चारों पंचायतों के सैकड़ों श्रद्धालु भक्त शामिल रहे।
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