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झारखंड के डोमिसाइल बलिदानियों की याद में श्रद्धांजलि सभा का आयोजन

एस. पी. सक्सेना/रांची (झारखंड)। झारखंड में डोमिसाइल नीति लागु करने की मांग को लेकर किए गये आंदोलन में मारे गये आंदोलनकारियों की याद में 24 जुलाई को राजधानी रांची के डोरंडा में बलिदान दिवस मनाया गया।

आदिवासी मूलवासी जनाधिकार मंच द्वारा आयोजित बलिदान दिवस पर उपस्थित सैकड़ो झारखंडी मुलवासियों ने डोमिसाइल शहीदों को श्रद्धांजलि दी। इस अवसर पर अपने संबोधन में झारखंडी सूचना अधिकार मंच के केंद्रीय अध्यक्ष सह आदिवासी मूलवासी जनाधिकार मंच के केंद्रीय उपाध्यक्ष विजय शंकर नायक ने कहा कि शहीदों का बलिदान व्यर्थ नहीं जाएगा। हम झारखंड के आदिवासी मूलवासी समाज के हक, अधिकार और सम्मान की रक्षा के लिए हर कीमत पर लड़ेंगे। कहा कि डोमिसाइल आंदोलन के अमर शहीदों के सपनों को पूरा करेंगे।

रांची के डोरंडा स्थित मेकॉन कॉलोनी त्रिमूर्ति चौक पर डोमिसाइल आंदोलन के अमर शहीदों कैलाश कुजूर, विनय तिग्गा, और संतोष कुंकल की 23वीं पुण्यतिथि के अवसर पर माल्यार्पण समारोह और संकल्प सभा का आयोजन किया गया। साथ हीं आदिवासी-मूलवासी समाज के अधिकारों व डोमिसाइल नीति को लागू करने के लिए अटल संकल्प लिया गया।

झारखंडी सूचना अधिकार मंच के केंद्रीय अध्यक्ष सह आदिवासी मूलवासी जनाधिकार मंच के केंद्रीय उपाध्यक्ष विजय शंकर नायक, आदिवासी मूलवाासी जनाधिकार मंच के केन्द्रीय अध्यक्ष राजू महतो ने कहा कि 24 जुलाई 2002 को डोमिसाइल स्थानीयता के आंदोलन में झारखंडी समाज के हक, अधिकार और झारखंड के मूलनिवासी समाज के हिस्सेदारी के लिए संघर्ष करते हुए कैलाश कुजूर, विनय तिग्गा व् संतोष कुंकल ने अपने प्राणों की आहुति दी। इन शहीदों का बलिदान झारखंड के आदिवासी-मूलवासी समाज के लिए एक अमर प्रेरणा है। हम उनके सपनों को साकार करने और स्थानीय नीति को लागू करने के लिए अंतिम सांस तक संघर्ष करेंगे।

नायक ने मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन पर तीखा हमला बोलते हुए उन्हें आदिवासी-मूलवासी समाज का सबसे बड़ा गद्दार कहा। उन्होंने कहा कि हेमंत सोरेन ने डोमिसाइल आंदोलन को अपने निजी स्वार्थों और सत्ता की लालसा के लिए हथियार बनाया। हेमंत सोरेन ने मुख्यमंत्री बनने के बाद भी डोमिसाइल नीति को लागू करने में कोई ठोस कदम नहीं उठाया। शहीदों के पवित्र बलिदान का अपमान किया और आदिवासी-मूलवासी समाज के साथ घोर विश्वासघात किया।

सोरेन सरकार की निष्क्रियता पर सवाल उठाते हुए कहा कि हेमंत सोरेन ने चुनाव पुर्व 1932 के खतियान आधारित डोमिसाइल नीति को लागू करने का वादा किया था, लेकिन उनके शासन काल में यह मुद्दा केवल सियासी नाटक बनकर रह गया। कहा कि वर्ष 2022 में विधानसभा में पास किया गया डोमिसाइल बिल राज्यपाल द्वारा वापस किए जाने के बाद भी सोरेन सरकार ने कोई ठोस कार्रवाई नहीं की। यह स्पष्ट है कि नेताओं ने शहीदों के खून को अपनी सियासी चमक के लिए इस्तेमाल किया, जो न केवल शर्मनाक, बल्कि अक्षम्य अपराध है।

महतो ने कहा कि वे हेमंत सोरेन को सीधे चुनौती देते है कि हेमंत सोरेन बताएं कि स्थानीय एवं नियोजन नीति के लिए उनकी सरकार ने क्या ठोस कदम उठाए ? उनके कार्यकाल में आदिवासी-मूलवासी समाज के हक और अधिकारों को लगातार कुचला गया। 1932 के खतियान आधारित नीति को लागू करने का उनका वादा केवल चुनावी जुमला साबित हुआ। उनकी चुप्पी और निष्क्रियता ने साबित कर दिया कि वे केवल सत्ता के भूखे हैं, न कि समाज के सच्चे हितैषी। उन्होंने वीर शहीदों के परिवार वालो को एक करोड़ रुपये एवं मेकॉन मे डोमिसाइल शहीदों के नाम पर पार्क बनाने तथा आश्रित परिवार को सरकार द्वारा सम्मान देने, शहीद का दर्जा देने की मांग की।

सर्जन हांसदा ने कहा कि यह आयोजन शहीदों के बलिदान को याद करने और उनके अधूरे सपनों को पूरा करने का संकल्प लेने का अवसर है। कहा कि हम सोरेन जैसे नेताओं के धोखे को बेनकाब करेंगे और स्थानीय एवं नियोजन नीति तथा आदिवासी-मूलवासी समाज के अधिकारों के लिए एकजुट होकर निर्णायक संघर्ष करेंगे। उन्होंने कहा कि झारखंडी सूचना अधिकार मंच और आदिवासी मूलवासी जनाधिकार मंच इस मुद्दे पर किसी भी तरह का समझौता नहीं करेगा। शहीदों का बलिदान व्यर्थ नहीं जाएगा। हम झारखंड के मूलवासियों के हक और सम्मान की रक्षा के लिए हर कीमत पर लड़ेंगे।
डोमिसाइल शहीदों के चित्र ल माल्यार्पण करने वालो मे अजित उरांव, रंजीत उरांव, कर्मा लिंडा, इकबाल हसन, गोपाल महतो, राजेश वर्मा, विनीता खलखो, एरिन कच्छप, परवीन सहाय, बिकुल डांग, दीपक पासवान, अशोक राम, मंटू राम, अजय नाग सहित सैकड़ों कार्यकर्ता उपस्थित थे।

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