देश स्तर पर पसंद किया जा रहा यहां का रसीला आम
अवध किशोर शर्मा/सारण (बिहार)। सारण जिला के निकटवर्ती वैशाली जिला के हद में नामीडीह गांव के किसानों ने अपने परिश्रम से मालदह, लंगड़ा, सीपियां, शुक्कुल और आम्रपाली जैसी उन्नत किस्म के आम की खेती कर राष्ट्रीय स्तर पर अपनी और अपने गांव की पहचान कायम करने में सफलता हासिल की है।
वैशाली जिला के हद में लालगंज प्रखंड के प्रगतिशील किसान एवं कृषि, बागवानी एवं पर्यावरण पर कई पुस्तकों के लेखक जितेन्द्र कुमार सिंह ने बताया कि वर्ष 2009 में नई दिल्ली में आयोजित राष्ट्रीय आम महोत्सव में नामीडीह के आम उत्पादकों के रसीले आमों को उपभोक्ताओं ने खूब पसंद किया था। बताया कि राष्ट्रीय बागवानी बोर्ड और दिल्ली टूरिज्म के संयुक्त तत्वावधान में यह महोत्सव तीन से पांच जुलाई तक आयोजित किया गया था। नामीडीह के दस सदस्यीय आम उत्पादकों का दल महोत्सव में भाग लिया।

महोत्सव के दूसरे दिन आम उत्पादन, फल प्रबंधन और निर्यात पर आयोजित गोष्ठी में वैशाली के आम पर प्रकाशित स्मारिका का दिल्ली टूरिज्म के अध्यक्ष-सह-प्रबंध निदेशक पी के त्रिपाठी और राष्ट्रीय बागवानी बोर्ड के प्रबंध निदेशक विजय कुमार ने लोकार्पण किया। इस स्मारिका का प्रकाशन नामीडीह के किसानों द्वारा गठित हरित कृषक क्लब द्वारा किया गया था। एक विशेष बात यह रही कि महोत्सव में यहां के रसीले व् स्वादिष्ट आमों को विशेष महत्व दिया गया। साथ ही यह पहला किसान क्लब और जिला साबित हुआ, जहां के आम उत्पादक अपने स्मारिका के साथ महोत्सव में भाग लिया। बताया गया कि, इसके पहले भी 31 जनवरी से 2 फरवरी 2008 तक नई दिल्ली के प्रगति मैदान में आयोजित राष्ट्रीय उद्यान प्रदर्शनी में नामीडीह के किसानों ने भाग लिया था।
ग्रुप फार्मिंग- ग्रेडिंग- पैकेजिंग के बाद मार्केटिंग उत्पादन और विपणन का बना प्रेरक स्लोगन
यहां के किसानों ने अपने बगीचे से सीधे अपने आम को उत्तर प्रदेश के वाराणसी, जौनपुर, इलाहाबाद, देवरिया, झारखंड के जमशेदपुर, रांची, बोकारो, झरिया, बंगाल के आसनसोल, दुर्गापुर, बंडिल इत्यादि शहरों में भेजना शुरू कर दिया। जिसका परिणाम काफी सकारात्मक रहा। अब तो लालगंज में ही दो-दो मंडी खुल गई है, जहां दूर दराज के व्यवसायी यहां से फल एवं सब्जियां खरीदारी कर ले जाते हैं।
गांव में नई तकनीक से हो रही भिन्डी की खेती
नामिडीह गांव जिला मुख्यालय हाजीपुर से सोलहवें किलोमीटर पर स्थित है। किसान ढाई-तीन दशक पूर्व तक पारम्परिक खेती से जुड़े थे। खेती अक्सर घाटे का सौदा साबित होती थी। बाद में यहां सब्जियों की खेती शुरू हुई और बदल गई गांव की आर्थिक तस्वीर। इस गांव में एक नई तकनीक से भिन्डी की खेती शुरू हुई, जो अन्यत्र नहीं है। उच्च घनत्व तकनीक का इस्तेमाल किया गया जो पूर्णतया सफल हुआ। वाराणसी के रहने वाले वैज्ञानिक श्रीराम सिंह और आरा रहिवासी विशेषज्ञ मनीष वर्मा ने इस ग्राम के ग्रामीणों के उत्साह को देखकर तकनीकी जानकारी दी, जिसका नतीजा यह हुआ कि किसान तकनीकी रूप से काफी समृद्ध हो गए।
स्थानीय बाजार मसलन हाजीपुर, लालगंज, पटना एवं मुजफ्फरपुर के बाजारों में यहां के भिन्डी की जबरदस्त मांग रहती है। सुबह होते ही किसान सब्जी तोड़ने से लेकर बाजार पहुंचाने और बेचने में व्यस्त रहते हैं। बरसात के दिनों में सिंचाई के लिए गंडक नदी के तटबंध पर बने स्युलिस गेट से छोटे-छोटे नहर निकला है। उसके द्वारा भी सिंचाई की जाती है। कृषि समन्वयक सुनील कुमार सिंह, सलाहकार अजय कुमार सिंह और संजय कुमार चरण बताते हैं कि इस गांव के किसान बहुत जागरूक हैं।
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