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पर्युषण: आत्मानुष्ठान का महापर्व है-पूज्या प्रियस्मिता श्रीजी महाराज

एस.पी.सक्सेना/गिरिडीह (झारखंड)। श्री जैन श्वेताम्बर सोसायटी शिखरजी महातीर्थ के तत्वावधान में एक से 9 सितंबर तक चल रहे अष्टयामी पर्यूषण महापर्व को लेकर जैन धर्मावलंबियों का सबसे बड़ा पवित्र स्थल गिरिडीह जिला (Giridih district) के हद में पारसनाथ स्थित धर्म-स्थल में लगातार भक्तों का तांता लगा है।

इस अवसर पर जैन धर्म के पूज्या प्रियस्मिता श्रीजी महाराज की सनिधि में पर्युषण पर्वाधिराज की अराधना चल रहीं हैं।

पर्युषण महापर्व के सातवे दिवस की शुभ प्रभात बेला में यहां वांचना अध्य का आयोजन किया गया। प्रियस्मिता श्रीजी ने कहा कि वांचना पर्व के समान है। कल्पसूत्र की वांचना कल्पवृक्ष के समान हैं। उन्होंने कहा कि प्राचीन काल से जैन संघ में कल्पसूत्र की महिमा अनेरी है।

जनमानुष के दिल में उसके श्रद्धापूर्वक आस्था का स्थान है। कल्पसूत्र में ही लिखा गया है कि सद्भाव पूर्वक कल्पसूत्र को यदि कोई भी व्यक्ति 3-5-7-21 बार श्रवण करता है, तो सातवें भव में मुक्ति पद को प्राप्त करता हैं।

साध्वीश्री ने कहा कि कल्पसूत्र की प्राचीन काल से सुवर्ण अक्षरों में अनेकों प्रतियाँ ज्ञान भंडारों में उपलब्ध है। भारत की प्राचीन चित्रकला और उस समय के रीति रिवाज व संस्कृति का भी परिचय देता है कल्पसूत्र।

डॉ. साध्वी प्रियलताश्री ने अपने संबोधन में प्रार्श्वनाथ भगवान, नेमिनाथ भगवान, आदिनाथ भगवान, श्रमण भगवान, महावीर स्वामीजी के चरित्र पर विस्तृत विवेचन प्रस्तुत किया। जिसमें कहा गया कि पट्टावली, स्थिरावली, साधु समाचारी आदि पर प्रेरणास्पद ऐतिहासिक वर्णन किया गया है।

कल्पसूत्र की हृदयंगम, लाक्षणिक और सौंदर्यमय विशिष्ट शैली में उल्लेख भद्रबाहु स्वामी ने किया है। जिसका एक-एक अक्षर जीवन में पवित्रता का संचार करने वाला है, ये मंगल प्रस्तुति आत्मानुष्ठान अभिवृद्धि का सर्जक है।

साध्वीश्री ने कहा कि पर्युषण पर्व के दौरान प्रतिदिन भक्तामर, स्नानपूजा, भक्त अभिषेक प्रतिक्रमण, प्रवचन सामायिक एवं संगीतमय हाऊजी, अंतराक्षरी प्रतियोगीता भक्ति चलो तीर्थ यात्रा चले आदि विभिन्न स्पर्धाएं आयोजित है।

उक्त जानकारी श्री जैन श्वेताम्बर सोसायटी के झारखंड प्रदेश मीडिया प्रभारी हरीश दोशी उर्फ राजू भाई तथा अजय जैन ने संयुक्त रूप से दी।

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