एस. पी. सक्सेना/रांची (झारखंड)। वरिष्ठ कांग्रेसी नेता विजय शंकर नायक के अनुसार केंद्र की भाजपा नित मोदी सरकार भारत-अमेरिका ट्रेड डील को एक ऐतिहासिक उपलब्धि के रूप में प्रचारित कर रही है। जबकि, सच्चाई यह है कि यह समझौता भारत के किसानों, छोटे उद्योगों, श्रमिकों और घरेलू बाजार के लिए आर्थिक खतरे की घंटी है। यह डील आत्मनिर्भर भारत का विस्तार नहीं, बल्कि भारतीय अर्थव्यवस्था को विदेशी कॉर्पोरेट के सामने झुकाने की नीति प्रतीत होती है।
नायक ने 9 फरवरी को कहा कि सवाल यह नहीं है कि अमेरिका को कितना फायदा होगा। सवाल यह है कि भारत को कितना नुकसान झेलना पड़ेगा। उन्होंने कहा कि इस डील से देश के किसानों के लिए खतरा उत्पन्न हो गया है। कहा कि अमेरिका अपने किसानों को भारत की तुलना में 5 से 10 गुना अधिक सब्सिडी देता है। जहाँ अमेरिकी किसानों को प्रति वर्ष ₹3 से 5 लाख तक सरकारी सहायता मिलती है, वहीं भारतीय किसान को औसतन ₹14,000 से ₹18,000 प्रति वर्ष सहायता मिलती है। डेटा कहता है कि वर्ष 2025 में अमेरिका से भारत में कृषि आयात में 34 प्रतिशत से अधिक वृद्धि, भारत के कृषि निर्यात में 13.6 प्रतिशत की गिरावट हुई है। यदि सोयाबीन, डेयरी, मक्का, एथेनॉल और प्रोसेस्ड फूड पर आयात खुला तो भारतीय किसान मूल्य प्रतिस्पर्धा में तबाह हो जाएगा। यह किसानों की आय, एमएसपी और ग्रामीण रोज़गार पर सीधा हमला है।
उन्होंने कहा कि भारत की लगभग 30 प्रतिशत जीडीपी और 11 करोड़ से अधिक नौकरियाँ एमएसएमई सेक्टर पर निर्भर हैं।लेकिन अमेरिकी टैरिफ दबाव से वस्त्र निर्यात में 20 से 30 प्रतिशत गिरावट, चमड़ा, खिलौना, फर्नीचर, इलेक्ट्रॉनिक्स जैसे क्षेत्रों में छोटे उद्योग बंद होने के कगार पर है। यदि अमेरिकी उत्पाद सस्ते टैरिफ पर आया तो लाखों एमएसएमई इकाइयाँ बंद होंगी, करोड़ों नौकरियाँ जाएँगी।
नायक ने कहा कि भाजपा सरकार कॉर्पोरेट मित्र व्यापार कर रही है, लेकिन छोटे उद्योगों और श्रमिकों के लिए कोई सुरक्षा नीति नहीं है। इस व्यापार समझौता से भारतीय बाजार में असंतुलन बढ़ेगा। अमेरिका को लाभ जबकि भारत को घाटा होगा। नई डील के बाद अमेरिकी कंपनियों को अधिक टैरिफ राहत और बाज़ार पहुँच व् भारतीय उत्पादों पर गैर-टैरिफ बाधाएँ बनी रहेंगी। इसका अर्थ है लाभ अमेरिका का, बाज़ार भारत का। नुकसान भारतीय उत्पादक का। इस ट्रेड डील के तहत जीएम फसलें, केमिकल-इंटेंसिव कृषि उत्पाद, बड़े पैमाने पर प्रोसेस्ड फूड भारत के बाज़ार में आ सकते हैं।
इस डील से पारंपरिक खेती का विनाश, स्वास्थ्य संकट, जैव विविधता और पर्यावरण को नुकसान है। यह केवल व्यापार नहीं भारत की खाद्य संप्रभुता पर हमला है। व्यापार युद्ध का सीधा असर वैश्विक शोध बताता है कि ट्रेड लिबरलाइजेशन और टैरिफ वॉर से विकासशील देशों में नौकरियाँ सबसे पहले खत्म होती हैं। इसे भारत पहले ही झेल रहा है। 45 वर्षों में सबसे अधिक बेरोज़गारी, युवाओं में रिकॉर्ड स्तरीय जॉब क्राइसिस है और अब भाजपा सरकार एक ऐसी डील कर रही है जो रोज़गार संकट को और गहरा करेगी।
नायक ने सवालिया लहजे में कहा कि भाजपा देश से सच क्यों छुपा रही है? ट्रेड डील का पूरा मसौदा सार्वजनिक नहीं, संसद में व्यापक चर्चा नहीं, किसानों, एमएसएमई और ट्रेड यूनियनों से कोई परामर्श नहीं, यह लोकतंत्र नहीं बल्कि, यह कॉर्पोरेट दबाव में बनाई गई नीति है। यदि यह डील भारत के हित में है तो सरकार इसे सार्वजनिक करने से डर क्यों रही है?
भाजपा की नीति विदेशी कॉर्पोरेट को प्राथमिकता, घरेलू उद्योगों की उपेक्षा, किसानों की अनदेखी, प्रचार आधारित राष्ट्रवाद है। वहीं कांग्रेस का दृष्टिकोण किसान-केंद्रित व्यापार नीति और घरेलू उद्योग की सुरक्षा, संतुलित वैश्विक व्यापार, रोजगार और सामाजिक न्याय को प्राथमिकता देना है। कहा कि कांग्रेस मानती है कि व्यापार राष्ट्रीय हित के लिए होना चाहिए, विदेशी दबाव के लिए नहीं। यह डील विकसित भारत नहीं आर्थिक उपनिवेशवाद है। यदि किसान घाटे में जाए, छोटे उद्योग बंद हों, रोज़गार घटे, विदेशी कंपनियाँ भारतीय बाज़ार पर कब्ज़ा करें तो यह विकास नहीं यह 21वीं सदी का आर्थिक उपनिवेशवाद होगा।
उन्होंने कहा कि भारत–अमेरिका ट्रेड डील राष्ट्रीय गर्व का नहीं, राष्ट्रीय चिंता का विषय है। देश को जानने का अधिकार है कि क्या किसान सुरक्षित हैं? क्या एमएसएमई सुरक्षित हैं? क्या रोज़गार सुरक्षित हैं? और क्या यह समझौता भारत को मजबूत करेगा या निर्भर? यदि भाजपा सरकार जवाब नहीं देगी तो इतिहास इस डील को किसानों, युवाओं और घरेलू उद्योग के साथ सबसे बड़ा आर्थिक धोखा मानेगा। कहा कि कांग्रेस इस अन्याय के खिलाफ आवाज़ उठाती रहेगी, क्योंकि भारत बिकने के लिए नहीं, बनाने के लिए है।
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