उपायुक्त ने पंचायत प्रतिनिधियों को सहयोग का दिया आश्वासन
प्रहरी संवाददाता/बोकारो। झारखंड में अब पंचायतें जलवायु परिवर्तन संकट से लड़ने के लिए आगे आ रही हैं। पॉलिसी एंड डेवलपमेंट एडवायजरी ग्रुप (पीडीएजी), असर और पंच सफर की ओर से 16 जुलाई को पंचायतों का सम्मेलन (कॉन्फ्रेंस ऑफ पंचायत) का आयोजन किया गया।
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि बोकारो जिला उपायुक्त अजय नाथ झा थे। वहीं विशिष्ट अतिथि बोकारो के डिविजनल फॉरेस्ट ऑफिसर रजनीश कुमार थे। इस अवसर पर उपायुक्त झा ने सम्मेलन में मौजूद पंचायत प्रतिनिधियों से अपील की कि वे आने वाले तीन साल के लिए एक बड़ा प्लान बनाएं और अगले एक साल इसे धरातल पर उतारने के लिए काम शुरू करें। उन्होंने कहा कि खासकर इंड्रस्टी प्रभावित इलाकों में जलवायु सस्टेनेबिलिटी में काम करने की जरूरत है। प्रशासन इसमें सकारात्मक रूप से सहयोग करेगा।

उन्होंने कहा कि पंचायतों का सम्मेलन जैसे कार्यक्रमों को आगे ले जाने की जरूरत है। कहा कि पिछले कुछ दशकों में जब यह महसूस हुआ कि दुनिया का अस्तित्व ही खतरे में आ गया है, तब सस्टेनेबिलिटी की जरूरत महसूस हुई। इस सस्टेनेबिलिटी की पूर्ति गांवों से ही होगी। इसीलिए अब पंचायत प्रतिनिधियों को यह बोध करना जरूरी है कि जलवायु संरक्षण के लिए किए जा रहे उनके कामों का असर दुनिया को बचाने में कारगर साबित हो रहा है।
सम्मेलन में उत्तरी छोटानागपुर प्रमंडल के जिलों यथा बोकारो, रामगढ़, हजारीबाग, धनबाद, गिरिडीह, चतरा और कोडरमा के पंचायती राज संस्थान (पीआरआई) के 80 से ज्यादा प्रतिनिधियों ने भाग लिया। डिविजनल फॉरेस्ट ऑफिसर रजनीश कुमार ने कहा कि अब समस्याएं ग्लोबल है, लेकिन उनका प्रभाव लोकल है। जलवायु परिवर्तन को लेकर बन रही नीतियों का इनपुट गांवों से जाना चाहिए। क्योंकि पंचायती राज संस्थाएं इस समस्या का समाधान बेहतर तरीके से निकाल सकती हैं। उन्होंने कहा कि ग्रामीणों की स्थानीय समझ का इस्तेमाल जलवायु संकट से निपटने के लिए किया जाना चाहिए। कहा कि कॉमन्स संरक्षण भी जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए जरूरी है।
हजारीबाग जिला के हद में चुरचू प्रखंड की चरही पूर्वी पंचायत समिति सदस्य आशा राय ने बताया कि जलवायु परिवर्तन का असर गांवों में स्पष्ट दिख रहा है। स्थानीय चूड़ी नदी सूखने से मानव तथा वन्य जीव में संघर्ष बढ़ा है। हाथी खेती को नुकसान पहुंचा रहे हैं। कॉन्फ्रेंस ऑफ पंचायत में आने से गांवों को अनुकूल जलवायु बनाने के लिए जलवायु नीति और फंड लाने की समझ विकसित हुई है। साथ ही क्लाइमेट एक्शन और कॉमन्स को लेकर विचारों का आदान-प्रदान हुआ।

पंच सफर के निदेशक गुलाब चंद्र ने कहा कि ऐसे सम्मेलन झारखंड में जलवायु परिवर्तन के संकट से निपटने की दिशा में बड़ा कदम है। यह स्थानीय स्तर पर सामुदायिक संसाधनों के विकास के माध्यम से आजीविका को पंचायत में सुरक्षित करने का जरिया बनेगा। इससे जलवायु परिवर्तन की समस्या के समाधान के लिए क्षेत्रीय और राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय वित्तीय व्यवस्थाओं के बारे में जनप्रतिनिधियों की समझ विकसित होगी।
क्या हैं कांफ्रेंस ऑफ पंचायत के उद्देश्य?
बोकारो ज़िले में सीओपी टीम ने जिला के हद में बेरमो और गोमिया प्रखंडों में दो क्लस्टर बनाए हैं, जिनमें प्रत्येक में छह पंचायतें शामिल हैं। इस एक दिवसीय कॉन्फ्रेंस ऑफ पंचायत (सीओपी) में इस पर ध्यान केंद्रित किया गया कि पंचायती राज संस्थाएं (पीआरआई) सतत ग्रामीण विकास, जलवायु परिवर्तन संकट से निपटने की क्षमता और आर्थिक विकास को बढ़ावा देने के लिए जलवायु वित्त (क्लाइमेट फाइनेंस) कैसे प्राप्त कर सकती हैं और कैसे उसका प्रबंधन एवं प्रभावी उपयोग कर सकती हैं। सम्मेलन में आजीविका, जलवायु परिवर्तन और समानता के जुड़े संकटों से निपटने के लिए कॉमन्स का लाभ उठाने पर आवश्यक चर्चा की गई।
इसके अलावा सम्मलेन के प्रमुख विषय में कई विषयों पर चर्चा की गई। इनमें जलवायु वित्त प्राप्त और उपयोग करने के तरीकों को सुदृढ़ करना, भारत में जलवायु वित्त के कई तंत्र उपलब्ध होने के बावजूद, पीआरआई और इसके प्रतिनिधियों को अक्सर नौकरशाही बाधाओं, तकनीकी क्षमता एवं जानकारी की कमी और वित्तीय संसाधन उपलब्ध कराने वाले विभिन्न स्रोतों के साथ अपर्याप्त समन्वय के कारण धनराशि प्राप्त करने में कठिनाई होती है।
ऐसे में इस सीओपी के एक हिस्से में राष्ट्रीय और राज्य स्तर पर मौजूदा जलवायु वित्त तंत्रों की विस्तृत जानकारी प्रदान करना, प्रक्रिया या प्रणाली के ऐसे शुरूआती चरणों की पहचान करना जिससे पीआरआई वित्तीय संसाधन का प्रभावी लाभ उठा सके। जलवायु वित्त तंत्रों (जैसे, एनएएफसीसी, सीएएमपीए) संबंधी समझ बढ़ाना, वित्तीय संसाधन प्राप्त करने और उनके उपयोग संबंधी बाधाओं और अक्षमताओं की पहचान, पीआरआई स्तर पर जलवायु अनुकूलन अर्थात जलवायु परिवर्तन के प्रभावों के साथ समायोजन संबंधी पहलकदमियों के लिए बेहतर वित्तीय योजना तैयार करना और संसाधन जुटाने की ज्यादा कारगर रणनीतियाँ तैयार करना, जलवायु संकट से निपटने की क्षमता के लिए कॉमन्स शासन पर्यावरण को फिर से पहले जैसा बनाने और सतत ग्रामीण विकास के लिए समुदाय के नेतृत्व में कॉमन्स शासन सबसे अहम है।
ऐसे में सीओपी में आजीविका बढ़ाने के लिए समुदाय के नेतृत्व वाले कॉमन्स प्रबंधन के मॉडल पर चर्चा और विचार-विमर्श, भूमि क्षरण रोकने और पारिस्थितिकी तंत्र आधारित अनुकूलन को बढ़ावा देने वाले रणनीतियों पर चर्चा, पारंपरिक ज्ञान प्रणालियों को स्थानीय जलवायु शासन ढांचे में शामिल करना क्यों जरूरी हैं पर कार्य किया जायेगा।

सामुदायिक जंगल, चारागाह और जल स्रोत समेत पारिस्थितिक कॉमन्स (सामुदायिक प्राकृतिक स्रोत) भारत के ग्रामीण इलाकों का बहुत महवपूर्ण हिस्सा हैं, जो 35 करोड़ से अधिक रहिवासियों का भरण-पोषण करते हैं। हालाँकि, इन कॉमन्स का सालाना 4 प्रतिशत की दर से झरण हो रहा है। जिससे आजीविका पर संकट बढ़ रहा है। जलवायु संकट से निपटने की क्षमता घट रही है और संसाधनों के या न्यायपूर्ण वितरण संबंधी बाधाएं बढ़ रही हैं। विखंडित शासन प्रणाली, अपर्याप्त संस्थागत क्षमता और सीमित वित्तीय संसाधन जैसी संरचनात्मक बाधाएँ जमीनी स्तर पर सार्थक जलवायु कार्रवाई में बाधा डालती हैं।
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